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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1102, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1102

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ २६३

भिन्न कोई वस्तु नहीं। जैसे समुद्र में जल से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, सब जल ही जल है, वैसे ही आत्मा से भिन्न जगत् कोई वस्तु नहीं—सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त एक आत्मसत्ता ही स्थित है। जैसे अनेक घटों के जल में एक ही सूर्य का प्रकाश प्रतिबिम्बित होता है, वैसे ही अनेक देहों में एक ही आत्मा व्याप रहा है। वह न अस्त होता है और न उदय होता है; सदा एकरस अविनाशी पुरुष ज्यों का त्यों स्थित है। उसमें अहंभावना से संसार भासित होता है। जैसे सीपी में चाँदी की बुद्धि होती है वैसे ही आत्मा में अहंबुद्धि संसार का कारण है। जीव इसी बुद्धि से सब दुःखों का भागी होता है। जैसे वर्षाकाल में सब नदियाँ समुद्र में प्रवेश करती हैं, वैसे ही अनात्म के अभिमान से सब आपदाएँ प्राप्त होती हैं। वास्तव में चिन्मात्र ब्रह्म और जीव में रञ्चक भी भेद नहीं। दोनों एक रूप ही हैं। ऐसी बुद्धि ही बन्धन से मुक्ति का कारण है। आत्मा सबमें अनुस्यूत अर्थात् व्याप्त है। जैसे सूर्य का प्रकाश सब स्थानों में होता है, परन्तु जहाँ शुद्ध जल है वहाँ स्पष्ट दिखता है, वैसे ही आत्मा सब जगह पूर्ण रूप से व्याप्त है, परन्तु शुद्ध बुद्धि में ही भासित होता है। जैसे तरङ्ग और बुलबुलों में जल ही व्याप रहा है, वैसे ही अविनाशी आत्मा सर्वत्र व्यापा है। पर जैसे सुवर्ण में भूषण नहीं, वैसे ही आत्मा में जगत् का अभाव है।

हे राजन् ! यह संसार आत्मा में नहीं है; केवल आत्मा ही है। जो एक वस्तु पात्र की तरह आधार होता है, उसमें दूसरी वस्तु होती है। पर आत्मा तो अद्वैत है, उसमें दूसरी वस्तु संसार कहाँ से हो ? जैसे सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं—वास्तव में कुछ नहीं, वैसे ही आत्मा में संसार अज्ञान से कल्पित है, वास्तव में कुछ नहीं, केवल चिदाकाश है। जैसे नदियाँ और समुद्र नाममात्र भिन्न हैं, वास्तव में जल ही है, वैसे ही केवल चिदाकाश में विश्व नाममात्र का है। जितने आकार दीखते हैं, उनको काल खा जाता है। जैसे नदियों का भक्षण करके समुद्र नहीं अघाता, वैसे ही पदार्थ-समूहों का काल भक्षण करके नहीं अघाता। हे राजन् ! ऐसे पदार्थों में क्या अभिलाषा करनी है ? कई