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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1103, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1103

२६४ * योगवासिष्ठ *

कोटि प्राणियों की सृष्टि उत्पन्न होती है और उसको काल खा जाता है-कोई पदार्थ काल में मुक्त नहीं होता, जैसे समुद्र में तरङ्ग और बुल-बुले उपजते हैं और नष्ट हो जाते हैं। इससे तू काल में अतीतपद की भावना कर, जिसमें काल का भी भक्षण कर सके। कैसे भावना करिये और कैसे भक्षण करिये, सो भी सुन। जैसे मन्दराचल ने अगस्त्यमुनि के आने की भावना की है वैसे ही तू भी अपने स्वरूप की भावना कर, तब काल का भक्षण करेगा। जैसे अगस्त्यमुनि ने समुद्र को पी लिया था, वैसे ही आत्मारूपी अगस्त्य कालरूपी समुद्र को खा जायगा।

हे राजन् ! जन्म-मरणादिक विकार भ्रम से है और आत्मा के प्रमाद से भासित होते हैं। जब आत्मा को निश्चय करके जानोगे तब कोई विकार न भासित होगा; क्योंकि ये अज्ञान से रचे हैं-आकाश में कोई विकार नहीं। जैसे भ्रम से रस्सी में सर्प दिखता है, सो तब तक है, जब तक रस्सी को नहीं जाना, और जब रस्सी को जाना, तब सर्प का भ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही जन्म-मरणादिक विकार आत्मा में तब तक दिखते हैं, जब तक आत्मा को नहीं जाना। जब आत्मा को जानोगे तब सब विकार नष्ट हो जावेंगे। हे राजन् ! विकार से रहित आत्मा तेरा स्वरूप है। उसकी भावना कर, जिसमें तेरे दुःख नष्ट हो जावें। आत्मपद को कहीं खोजने नहीं जाना है; न किसी वस्तु को जानकर ग्रहण करना है कि यह आत्मा है; और न किसी काल की अपेक्षा ही है। आत्मा तेरा अपना स्वरूप है और सर्वदा अनुभवरूप है। तुझसे भिन्न कुछ वस्तु नहीं। तू अपने यथार्थ रूप को जान। आत्मा के न जानने से मनुष्य अपने को दुःखी जानता है। मैं मरूँगा, मैं दरिद्री हूँ, मैं दास हूँ इत्यादि दुःख तब तक होते हैं, जब तक आत्मा को नहीं जाना। जब आत्मा को जानोगे, तब आनन्दरूप हो जाओगे।

जैसे किसी स्त्री की गोद में पुत्र हो और वह स्वप्न में देखे कि बालक मेरे पास नहीं है तो बड़े दुःख को प्राप्त हो और रुदन करने लगे, पर जब स्वप्न से जागे और देखे कि बालक उसकी गोद में है तो बड़े आनन्द को प्राप्त हो और उसके दुःख-शोक नष्ट हो जावें। हे राजन् !

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1103, कुल 1734 में से · BharatKosha