योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❈ निर्वाण प्रकरण ❈ २६५
वैसे ही तेरा आत्मा तेरे पास और सदा अनुभवरूप है। उसके प्रमाद से तू अपने को दुःखी जानता है। जब अज्ञानरूपी निद्रा से तू जागेगा, तब अपने को जानेगा और तेरे दुःख और शोक नष्ट हो जावेंगे। देह और इन्द्रियादिक जो दृश्य हैं, उनसे मिलकर अपने को यह जानना कि मैं हूँ, यही अज्ञाननिद्रा है। इससे रहित होकर देख, जिसमें आनन्द को प्राप्त हो। ये जो पदार्थ दिखते हैं, सब मिथ्या हैं। जैसे बालक मृत्तिका में राजा, मेना, हाथी और घोड़े की कल्पना करता है, किन्तु वास्तव में उनमें न कोई राजा होता है, न मेना होती है, न कोई हाथी-घोड़ा होता है एक मृत्तिका ही होती है, वैसे ही चित्तरूपी बालक ने आत्मरूपी मृत्तिका में जो राजा और मेना आदिक सम्पूर्ण विश्व की कल्पना की है, सो सब मिथ्या है। हे राजन् ! एक उपाय तुझसे कहता हूँ, उसे कर, जिसमें तेरे दुःख नष्ट हो जावें। एक वस्तु जो 'अहं अभिलाषा सहित वासना है, उसका त्याग कर। फिर जहाँ इच्छा हो वहाँ विचर। तुझे दुःख का स्पर्श न होगा। संकल्प ही उपाधि है और कोई उपाधि नहीं। जैसे जब मणि तृण से ढकी होती है, तब नहीं देख पड़ती और जब तृण दूर करिये तब मणि प्रकट हो जाती है, वैसे ही आत्मारूपी मणि वासनारूपी तृण से ढकी है। जब वासनारूपी तृण दूर कीजिये, तब आत्मारूपी मणि प्रकट हो।
हे राजन् ! जाग्रत स्वप्न और सुषुप्ति से रहित जो आत्मपद है, उसको जब प्राप्त होगा, तब जानेगा कि मैं मुक्त हूँ। तेरा स्वरूप तो केवल आत्मरूप है, उस पद में स्थित हो। वह अजन्मा, नित्य, चैतन्य-मात्र और सबका अपना रूप है। उसी के प्रमाद से दुःख होता है। जैसे बालक मृत्तिका के खिलौने बनाते हैं और हाथी, घोड़ा आदि उनके नाम कल्पित कर अभिमान करते हैं कि ये मेरे हैं और उनका नाश होने से दुःखी होते हैं, वैसे ही बालकरूप अज्ञानी स्वरूप के प्रमाद में अभिमान करता है कि ये मेरे हैं और मैं इनका हूँ, और उनका नाश होने से दुःखी होता है—यह नहीं जानता कि सत् का नाश नहीं होता। का असत् नाश होने में सत् का नाश मान बैठता है। जैसे घट का