योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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नाश होने से घटाकाश का नाश मानिये, वैसे ही मूर्खता से दुःख पाता है। हे राजन् ! तू अपनी आत्मा जान। आत्मादिक संज्ञा की शास्त्रों ने उपदेश के लिए कल्पित की है, नहीं तो आत्मा अनिर्वच-नीय पद है। उसमें वाणी की गति नहीं, पर इन्हीं से जाना जाता है, क्योंकि मन और वाणी में भी आत्मसत्ता है; उसी से आत्मादिक संज्ञा सिद्ध होती है। जैसे जितने स्वप्न के पदार्थ हैं; उनमें अनुभवसत्ता है, उससे वे पदार्थ सिद्ध होते हैं, वैसे ही जितनी कुछ अर्थ-संज्ञाएँ हैं, वे सब आत्मा से सिद्ध होती हैं। ऐसा जो तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो जिसमें जरा-मृत्यु आदि दुःख नष्ट हो जावें ।
हे राजन् ! निःस्पन्द होकर देखेगा तो स्पन्दन में भी वही भासित होगा, और स्पन्दन-निःस्पन्दन तुल्य ही जान पड़ेंगे । जो समाधि में होगा अथवा चेष्टा करेगा तो भी तुल्य होंगी। और न समाधि में शान्ति भासित होगी और न चेष्टा में दुःख होगा। दोनों में एकरस रहेगा। हे राजन् ! देना अथवा लेना, यज्ञ, दान आदिक क्रियाएँ, जो कुछ प्राकृत आचार प्राप्त हो, उसकी मर्यादा और शास्त्र की विधि से कर, पर निश्चय आत्मस्वरूप में ही रख। जैसे नट तरह-तरह के स्वाँग भरकर सम्पूर्ण चेष्टाएँ करता है, पर उसमें निश्चय नटत्व ही का रहता है, वैसे ही तू सब चेष्टाएँ कर, पर उसके अभिमान और संकल्प से रहित हो। ग्रहण अथवा त्याग, जो कुछ स्वाभाविक रूप से प्राप्त हो, उसमें ज्यों का त्यों रह। जब निर्विकल्प होकर अपने स्वरूप को देखेगा, तब उत्थानकाल में भी तुझे आत्मा ही दिखेगा। जैसे जल के जानने से तरङ्ग, फेन, बुलबुले आदि सब जल ही भासित होते हैं, वैसे ही जब तू आत्मा को जानेगा, तब संसार भी आत्मरूप दिखेगा। जो आत्मा को नहीं जानता, उसको जगत् ही दिखता है और उससे वह दुःख पाता है। इससे तू अन्तर्मुख हो और संकल्प को त्यागकर परम निर्वाण अच्युतपद में स्थित हो।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे गजइक्ष्वाकुप्रत्यक्षोपदेशो नाम पञ्चषष्टितमस्सर्गः ॥ ६६ ॥