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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1106, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1106

२६८ ❇ योगवाशिष्ठ ❇

है, न असत् है, न कोई देश है, न काल है, न कोई पदार्थ है। केवल चैतन्यमात्र गुणातीत है। उसमें न कोई गुण है, न माया है। केवल शान्तरूप आत्मा है।

हे राजन् ! वह शास्त्रों और गुरु के वचनों से पाया जाता है, कोरे तप से नहीं मिलता। केवल अपने आप जाना जाता है, शास्त्रादिक तो लखा देते हैं, परन्तु "यह है" ऐसा कहकर नहीं जनाते। द्रष्टा पुरुष अपने आप जानता है। जैसे नेत्रों में जो सूर्य की ज्योति है, वही सूर्य को देखती है; वैसे ही आत्मा ही आत्मा को देखता है। वह अन्तर्मुख और संकल्प से रहित होकर अपने को आप देखता है। जब संकल्प बहिर्मुख होता है, तब वही दृढ़ होकर स्थित होता है और फिर उसकी भावना होती है। तब संकल्परूप जगत् दृढ़ता से स्थित होता है, तब दुःखदायी होता है। हे राजन् ! जीव को और कोई दुःखदायी नहीं, अपने ही संकल्प से असम्यग्दर्शी दुःखी होता है। सम्यग्दर्शी को जगत् दृष्टिगोचर होने पर भी दुःखदायी नहीं होता। जैसे रम्मी में सर्प की भावना होती है तो भय प्राप्त होता है, फिर जब रम्मी को जान लेने से सर्प का भ्रम दूर होता है, तब भय भी जाता रहता है, वैसे ही पुरुष को जो संसार की भावना होती है, वह दुःखदायी है इससे आत्मा की भावना कर, जिससे तेरे सब दुःख नष्ट हो जावें। हे राजन् ! तू सर्वदा आनन्दरूप और अद्वैत है। तुझमें कोई कल्पना नहीं, तू आत्मस्वरूप है। आत्मा छहों काम, क्रोध आदि विकारों से रहित है। विकार मिथ्या देह के हैं, आत्मा शुद्ध है। आत्मा के प्रमाद से विकार भासित होते हैं। जब तू आत्मा को जानेगा, तब कोई विकार न देख पड़ेगा; क्योंकि आत्मा अद्वैत है।

राजा ने पूछा, हे भगवन् ! तुम कहते हो कि आत्मा अद्वैत है। जो यह बात है तो पर्वत आदिक विश्व का कैसे भान होता है और पत्थररूप बड़े आकार बन के कहाँ से उपजे हैं ? इसका रूप क्या है, कृपा करके कहो। मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में संसार कोई नहीं। वह सदा शान्तरूप और निराकार है। उसमें स्पन्दन-निःस्पन्द दोनों शक्ति हैं। जब निःस्पन्द शक्ति होती है, तब केवल अद्वैत भासित होता