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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1107, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1107

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ २६६

है। और जब स्पन्दनशक्ति चेतती है, तब नाना प्रकार के जगत के आकार भासित होते हैं। पर वास्तव में आत्मा ही है—उससे भिन्न कुछ नहीं। जैसे समुद्र में तरङ्ग कुछ और नहीं, वही है, पर पवन के संयोग से तरंग उठते हैं तो भिन्न भिन्न नजर आते हैं; वैसे ही स्फुरणशक्ति से भिन्न-भिन्न अहंकार भासित होते हैं—वास्तव में सब आत्मस्वरूप हैं—इतर कुछ नहीं। जैसे वट के बीज में पत्ते, डाल, फूल और फल अनेक देख पड़ते हैं, वैसे ही आत्मसत्ता ने जो नाना प्रकार के आकार रखे हैं, वे यद्यपि देख पड़ते हैं, तो भी कुछ बना नहीं, केवल अद्वैत आत्मा ज्यों का त्यों स्थित है। वह सूक्ष्म से भी अति सूक्ष्म है। पर्वत आदिक जो विश्व दिखता है, सो सब आत्मा का चमत्कार है। जैसे स्वप्न में पर्वत और वृक्ष आदिक नाना प्रकार के आकारों का जो भान होता है, वह केवल अनुभव है—उससे इतर कुछ नहीं, वैसे ही जाग्रत विश्व भी आत्मा का अनुभवरूप है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं।

इक्ष्वाकु ने पूछा, हे भगवन् ! जो आत्मा सूक्ष्म है तो असतरूप पर्वतादिक स्थूल पदार्थ सत् होकर कैसे देख पड़ते हैं, यह कृपा करके कहो ? मुनि बोले, हे राजन् ! आत्मा में अनन्त शक्ति है। आत्मा से भिन्न कुछ नहीं, सब उसी के रूप हैं। जैसे सूर्य की किरण सूर्य से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा की शक्ति आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे पवन में दो शक्तियाँ हैं—स्पन्दन और निःस्पन्द, सो उसी का रूप है—स्पन्दन-शक्ति से प्रकट भासित होता है और निःस्पन्द से प्रकट नहीं भासित होता, वैसे ही आत्मा में भी स्पन्दन तथा निःस्पन्द, दो शक्तियाँ हैं। जब स्पन्दनशक्ति उठती है, तब अहंभाव प्रकट होता है और जब अहं-भाव हुआ, तब चित्त का उदय होता है। अहं ही चित्त है। जब चित्त हुआ तब आकाश की भावना से आकाश बन जाता है। जब स्पर्श की भावना हुई, तब पवन उत्पन्न होता है। रूप की भावना से अग्नि बनती है। जब रस की भावना हुई, तब जल उत्पन्न हुआ। इसी प्रकार चित्त की कल्पना से तत्त्व उपजे हैं। जब चारों तत्त्व इकट्ठे हुए, तब एक अण्ड बना। और जब दृढ़ संकल्प किया, तब स्वायंभुव मनु उत्पन्न