योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1108, कुल 1734 में से
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हुआ। जब अण्ड फूटा, तब स्वर्ग, मध्य (पृथ्वी) और पाताल, तीन लोक हुए। ये तीनों लोक राजस, सात्त्विक और तामस तीनों गुण हुए। फिर पर्वत आदिक दृश्य पदार्थ हुए।
हे राजन् ! केवल संकल्पमात्र से ही सब हुआ है। जब स्पन्दनशक्ति स्फुरती है, तब ये प्रकार आत्मा में भासित होते हैं, परन्तु वास्तव में कुछ बना नहीं। जैसे समुद्र में फेन और बुलबुले जो उठते हैं, सो जल रूप हैं—जल से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। आदि मनु जो स्वायम्भुव हैं, उनके संकल्प ने आगे मन रचे हैं। इसी प्रकार त्रिगुणमय सृष्टि उत्पन्न होती है, सो केवल संकल्पमात्र है। जब तक चित्त है, तबतक विश्व है; जब चित्तस्फुरण से रहित हुआ, तब शक्ति निःस्पन्द होती है और जब शक्ति निःस्पन्द हुई तब फिर जगत् नहीं दिखाई देता है। हे राजन् ! यह विश्व मन के स्फुरण से है और सत्य की नाईं स्थित हुआ है। मन जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु वह नहीं भासित होता और असत्य की नाईं भासित होता है। वह सत् कैसे असत्य की तरह हुआ है और असत् कैसे मन की तरह हुआ है, यह सुन। सत् जो है सर्वदेश, सर्वकाल, सर्ववस्तु सो नहीं भासित होता और असत्य जो परिच्छिन्नरूप देश-काल-वस्तु-परिच्छेद-संयुक्त है, वह मन जैसा भासित हुआ है। जहाँ देखिये, वहाँ दृश्य गुणमय संसार का भान होता है। यह माया महा आश्चर्यरूप है, जिसने सत्य में असत्य की और असत्य में सत्य की प्रतीति कराई है। चित्त के सम्बन्ध से ही संसार भासित होता है; आत्मा में संसार कदापि नहीं है। जब चित्त को स्थित करके देखोगे, तब तुम्हें संसार न भासित होगा।
जैसे गम्भीर जल होता है तो चलता नहीं दीखता, वैसे ही गम्भीर आत्मा में संसार नहीं जाना जाता कि कहाँ जगता है। संसार भी आत्मा से भिन्न कुछ वस्तु नहीं, आत्मस्वरूप ही है। जैसे अग्नि की चिनगारी और जल के तरङ्ग अग्नि और जल से भिन्न नहीं अथवा मणि का प्रकाश मणि से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा से संसार भिन्न नहीं; केवल आत्मस्वरूप है। ऐसे आत्मा को जानकर शान्ति पाओ।