योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1109, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❄ निर्वाण प्रकरण ❄ ३०१
जिसमे सारे दुःख नष्ट हो जावें। केवल शान्तपद आत्मा तेरा अपना रूप है। अपने स्वरूप को भूल तू दुःखी हुआ है। जब आत्मा को जानेगा, तब संसार भी आत्मरूप दिखेगा, क्योंकि वह आत्मस्वरूप है। आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। ऐसा आत्मा तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो। हे राजन् ! यह सब जगत् चिदाकाशरूप है, यही भावना दृढ़ कर। जिसकी ऐसी भावना दृढ़ है और जिसकी सब इच्छा शान्त हो गईं, उस पुरुष को कोई दुःख नहीं होता। उसने निरिच्छारूपी कवच पहिना है। हे राजन् ! जो अहँ के अर्थ से रहित है, जिसका सर्व शून्य हो गया है और जिसने निरालम्ब का आश्रय लिया है; वह पुरुष मुक्त है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मनुइक्ष्वाकुआख्याने सर्व-ब्रह्मप्रतिपादनं नाम सप्तषष्टितमसर्गः ॥ ६७ ॥
मनु बोले, हे राजन् ! यह संसार आत्मा से भिन्न कोई वस्तु नहीं। जैसे जल और तरङ्ग, सूर्य और किरणें, अग्नि और चिनगारी भिन्न नहीं है, वैसे ही आत्मा और संसार भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप ही है। जैसे इन्द्रियों के विषय इन्द्रियों में रहते हैं वैसे ही आत्मा में संसार है। जैसे पवन में जो स्पन्दन-निःस्पन्दशक्ति है सो पवन से भिन्न नहीं, वैसे ही संसार आत्मा से भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप है। हे राजन् ! विषय की सत्यता को त्यागकर केवल आत्मा की भावना कर, जिसमें तेरे संशय मिट जावें। तू आत्मस्वरूप और निर्गुण है; तुझको गुणों का स्पर्श नहीं होता और तू सबसे परे है। जैसे आकाश में धूल, धुवाँ और बादल ये विकार देख पड़ते हैं, पर आकाश निर्लेप रहता है, वह अद्वैतरूप है, वैसे ही ज्ञानवान् पुरुषों को, जिनको आत्मज्ञान हुआ है, सुख, दुःख, राजस, तामस, सात्त्विक गुण लिप्त नहीं करते। यद्यपि उनमें लोकदृष्टि में ये गुण दीखते हैं, पर वे अपने आत्मा में नहीं दीखते। जैसे समुद्र में अनेक तरङ्ग जलरूप होते हैं और शुद्ध मणि में नील, पीत आदिक प्रतिबिम्ब पड़ते हैं सो देखने भर को हैं, मणि को स्पर्श नहीं करते, वैसे ही जिस पुरुष के हृदय से वासना का मल दूर हुआ है, उसके शरीर से सम्बन्ध रखनेवाले राजस, सात्त्विक और तामस गुणों के कार्य