योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३०२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
सुख-दुःख देखने भरके होते हैं, उसे स्पर्श नहीं करते । उसमें केवल मत्त समान पद का निश्चय होता है और उसको कोई सङ्ग स्पर्श ना करता । जैसे आकाश को धूल लेप नहीं होता, वैसे ही आत्मा व गुणों का सम्बन्ध नहीं होता । जो पुरुष ऐसा जानता है, उसको ज्ञानी कहते हैं ।
जब जीव निःस्पन्द होता है, तब आत्मा होता है और जब उस वासना का स्पन्दन होता है, तब वह संसारी होता है । जब चित्त जगता है, तब अनेक सृष्टि भासित होती है, और जब चित्त स्फुरण रहित होता है, तब संसार का अत्यन्ताभाव होता है और प्रध्वंसाभाव भी नहीं भासित होता है । तब संसार भी केवल आत्मरूप हो जाता है इससे हे राजन् ! वासना को त्यागकर चित्त को स्थित करो । वासना ही मल है । जब वासना का त्याग होगा, तब केवल आकाश की तरह अपने को स्वच्छ जानोगे ! आत्मा वाणी का विषय नहीं वह केवल आत्मत्वमात्र, अपने रूप में स्थित और सर्वदा उदयरूप है । विश्व भी आत्मा का चमत्कार है; कुछ भिन्न वस्तु नहीं । द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की त्रिपुटी अज्ञान से भासित होती है; आत्मा सर्वदा एकरूप और त्रिपुटी से रहित है । चित्त के स्फुरण से आत्मा ही त्रिपुटी रूप होकर स्थित हुआ है, इससे चित्त को स्थिर कर देखो कि आत्मा में भिन्न कुछ वस्तु नहीं । वासना के स्फुरण में संसार है, जब वह मिटती है, तब संसार भी मिट जाता है । उस वासना के स्फुरण की निवृत्ति लिए सात भूमिका कहता हूँ ।
जब प्रथम जिज्ञासु होता है, तब चाहता है कि संतजनों का संग कर ब्रह्मविद्या-शास्त्र को देखे और सुने—यह प्रथम भूमिका है । भूमि चित्त के ठहरने के स्थान को कहते हैं । फिर जब सत्संग और शास्त्र में बुद्धि बढ़ी, तब सन्तों और शास्त्रों के कहने को विचारना कि मैं कौन हूँ और संसार क्या है—यह दूसरी भूमिका है । उसके उपरान्त यह विचार- ना कि मैं आत्मा हूँ; संसार मिथ्या है और मुझमें कोई संसार नहीं बारम्बार ऐसी भावना करना तीसरी भूमिका है । जब आत्मभावना