योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1111, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ३०३
दृढ़ता से आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सम्पूर्ण वासनाएँ मिट जाती हैं और जब स्वरूप मे नीचे के स्तर पर उतरकर देखता है, तब संसार भासित होता है, परन्तु उसे वह स्वप्न की नाईं जानता है—इसमें वासना नहीं उठती । ऐसा अवलोकन चौथी भूमिका है । जब अवलोकन होता है, तब आनन्द प्रकट होता है । ऐसे महाआनन्द का प्रकट होना और जब आनन्द प्रकट हो तब उसमें स्थिर होना पञ्चम भूमिका है । तुरीयापद छठी भूमिका है । चित्त की दृढ़ता का नाम तुरीयावस्था है । जब तुरीयातीतपद को प्राप्त होता है, तब परम निर्वाण होता है—उसको सप्तम भूमिका कहते हैं । उस परम निर्वाणपद की जीवन्मुक्त को गति नहीं, क्योंकि तुरीयातीतपद को वाणी मे बता नहीं सकते ।
प्रथम तीन भूमिका जो कही हैं, वे जाग्रत् अवस्था हैं । उनमें मनुष्य श्रवण, मनन और निदिध्यासन करता है और संसार की सत्ता भी दूर नहीं होती । चतुर्थ भूमिका स्वप्नवत् है । उसमें संसार की सत्ता नहीं होती । पञ्चम भूमिका सुषुप्ति अवस्था है; क्योंकि उसमें जीव आनन्दघन में स्थित होता है । छठी भूमिका तुरीयपद है, जो जाग्रत्-स्वप्न और सुषुप्ति, तीनों का साक्षी है । उसमें केवल ब्रह्म ही प्रकाश पाता है और चित्त निर्वाणपद में लय हो जाता है । तुरीयपद में जीवन्मुक्त लोग बिचरते हैं । सप्तम भूमिका तुरीयातीतपद है; वही परम-निर्वाणपद है । तुरीयावस्था में ब्रह्माकारवृत्ति रहती है । जब ब्रह्मा-कारवृत्ति भी लीन हो जाती है, जहाँ वाणी की गति नहीं, वहाँ चित्त नष्ट हो जाता है; तब वह केवल आत्मतत्त्वमात्र रह जाता है । उसमें अहंभाव नहीं होता । शान्त और परमनिर्वाण तेरा स्वरूप है और सब विश्व भी वही रूप है, कुछ भिन्न नहीं जैसे सुवर्ण ही भूषण है और सुवर्ण में भूषण कल्पित है । भूषण भी परिणाम मे होता है, पर आत्मा सदा अच्युतरूप है और कभी परिणाम को नहीं प्राप्त होता । वह केवल एक रस है । उसने चित्त के स्फुरण मे विश्व की कल्पना की है, इससे विकारसंयुक्त भासित होता है । हे राजन ! ऐसा आत्मा तुम्हारा