योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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स्वरूप है। उसमें स्थित होकर अपने प्रकृत आचार में निरहंकार होकर विचर। बल्कि अहंकार के त्याग का अभिमान भी त्यागकर केवल आत्मरूप हो रहो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमानिर्वाणवर्णनं नामाष्टनवतितमसर्गः ॥ ९८ ॥
मनु बोले, हे राजन् ! आदि-मध्य-अन्त में रहित अनाभास सर्व-चिदाकाश सत्ता ज्यों की त्यों स्थित है और आगे भी वही स्थित रहेगी। इसमें न ऊर्ध्व है, न अधः है, न तम है, न प्रकाश है और न कुछ उससे भिन्न है। वह सबकी सत्ता है, जो चिन्मात्र परम सार है। उसने आप ही संकल्प से चेतना की, तब जगत् हुआ। हे राजन् ! यह विश्व आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे जल में तरङ्ग, मिर्च में तीक्ष्णता, शक्कर में मधुरता, अग्नि में उष्णता, बर्फ में शीतलता, सूर्य में प्रकाश, आकाश में शून्यता और वायु में स्पन्दन है, वैसे ही आत्मा में जो विश्व है, वह आत्मस्वरूप ही है, आत्मा से भिन्न नहीं। हे राजन् ! जो सब आत्मस्वरूप ही है, तो शोक और मोह किसका करता है ? जैसे काष्ठ की पुतली यन्त्र के तागे से अनिच्छित चेष्टा करती है, वैसे ही नीतिरूप तागे से, अभिमान से रहित होकर, तू भी विचर और यह निश्चय रख कि न मैं कुछ करता हूँ, न कराता हूँ। किसी में रागद्वेष न कर। जैसे शिला पर जो मूर्ति लिखी होती है उसको न किसी का राग है और न द्वेष है, वैसे ही तू भी विचर। आत्मा से भिन्न कुछ न देख पड़े, ऐसा निरहंकार हो। चाहे व्यवहारी गृहस्थ हो चाहे संन्यासी, चाहे देहधारी हो चाहे देहत्यागी, चाहे विक्षेपी हो चाहे ध्यानी, तुझे कोई दुःख न होगा, तू ज्यों का त्यों ही रहेगा। वासना का होना ही संसार है और वासना से रहित होना मोक्ष है। जब वासना उठती है, तब संसारी होता है और जब वासना मिट जाती है, तब केवल आकाशरूप भासित होता है।
हे राजन् ! यह सब जगत् आत्मरूप है और आत्मा ही अपने आपमें स्थित है। जब सब आत्मा ही है, तब शोक और मोह किसका