योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1113, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ३०५
कीजिये। हे राजन्! आत्मा सर्वदा एकरस है और विश्व आत्मा का चमत्कार है। जन्म-मरण आदि नाना विकार आत्मा के अज्ञान में प्रतीत होते हैं। जब आत्मा का ज्ञान होगा, तब आत्मरूप ही एकरस भासित होगा और विषमता कुछ न रहेगी। संवेदन में आकार दीखते हैं। अहंकार और वासना के सम्बन्ध को संवेदन कहते हैं। अहंकार और चित्त, दोनों पर्यायवाची हैं। हे राजन्! इसका अहंकार के साथ होना ही दुःखदायी है। केवल चिन्मात्र में अहंभाव मिथ्या है। जब तक संवेदन दृश्य की ओर उठता है, तब तक दृश्य का अन्त नहीं आता और नाना प्रकार के विकार भासित होते हैं। पर जब संवेदन आत्मा अधिष्ठान की ओर आता है, तब आत्मा शुद्ध अपना रूप होकर भासित होता है।
संवेदन भी आत्मा का कल्पित आभास है। आभास के आश्रय में विश्व कल्पित हुआ है। फुरने में भी और न फुरने में भी आत्मा ज्यों का त्यों है। परन्तु फुरने में विषमता भासित होती है, और न फुरने में ज्यों की त्यों आत्मा भासित होता है। जैसे रश्मी के अज्ञान में सर्प दीखता है, जब रश्मी का ज्ञान होता है, तब सर्प की सत्यता जाती रहती है और रश्मी ज्यों की त्यों जान पड़ती है, पर सर्प जान पड़ने के काल में भी रश्मी ज्यों की त्यों ही थी, उसमें कुछ नहीं हुआ था—जानने न जानने में एक समान ही थी, वैसे ही आत्मा स्फुरण के समय में जगतरूप में दीखता है और स्फुरण के निवृत्त होने पर आत्मा ही भासित होता है, पर आत्मा दोनों कालों में एक समान है। जैसे सूर्य की किरणें सूर्य से भिन्न नहीं और अग्नि में उष्णता भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में विश्व भिन्न नहीं—आत्मस्वरूप ही है।
हे राजन्! अहंकार को त्याग करके अपने सत्ता-महान स्वरूप में स्थित हो, तब तेरे सब दुःख निवृत्त हो जावेंगे। एक कवच तुझको बनाता हूँ, उसको धारण करके विचर तो तुझ पर अनेक शस्त्रों की वर्षा होने पर भी तुझे दुःख न होगा। तू जो कुछ देखता-सुनता है, उसे सब ब्रह्म जान और बारम्बार यही भावना कर कि ब्रह्म से भिन्न कुछ नहीं।