योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1114, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३०६ ❇ योगवासिष्ठ ❇
जब ऐसी भावना दृढ़ करेगा, तब कोई शस्त्र तुझे काट न सकेगा। यह ब्रह्मभावना ही कवच है। जब इसको तू धारण करेगा, तब सुखी होगा।
इतना कह वाल्मीकिजी बोले कि जब वशिष्ठजी ने रामजी को मनु और इक्ष्वाकु का संवाद सुनाया, तब सायंकाल में सूर्य अस्त हुआ और सारी सभा और वशिष्ठजी भी स्नान को उठे। फिर सूर्य की किरणों के निकलते ही सब आ पहुँचे।
इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मोक्षरूपवर्णनं नाम नवनवतितमसर्गः ॥ ६६ ॥
मनु बोले, हे राजन! जिसका कारण ही मिथ्या है, उसका कार्य कैसे सत हो? यह आभास जो संवेदन है, वही विश्व का कारण है। जब आभास ही मिथ्या है, तब विश्व कैसे सत्य हो और जब विश्व ही असत है, तब भय और शोक किसका करना है? हे राजन! न कोई जन्मता है, न मरता है, न सुख है, न दुःख है, आत्मा ज्यों का त्यों स्थित है। उर्मा में संवेदन ने विश्व की कल्पना की है। इसमें संवेदन का त्याग कर कि 'न मैं हूँ, न यह है'। जब तुझे ऐसा दृढ़ निश्चय होगा, तब आत्मा ही शेष रहेगा और अहंकार निवृत्त हो जावेगा; क्योंकि आत्मा के अज्ञान में वह होता और आत्मज्ञान से ही नष्ट हो जाता है। हे राजन! जो वस्तु भ्रम सिद्ध हो और सत दिखे, उसको प्रथम विचारिये। जो विचार किये से रहे तो उसे सत्य और आत्मा जानिये; और जो विचार किये में नष्ट हो जावे तो उसको अनात्मा तथा मिथ्या जानिये। जैसे हीरा श्वेत होता है और बर्फ का कण भी श्वेत होता है, एक समान दोनों भासित होते हैं, पर उनकी परीक्षा के लिये सूर्य के सम्मुख दोनों को रखिये तो जो धूप में गल जाय उसे झूठा जानिये और जो ज्यों का त्यों रहे उसको सत जानिये, वैसे ही विचाररूपी सूर्य के सम्मुख करिये तो अहंकार बर्फ की नाईं नष्ट हो जाता है, क्योंकि जो अहंकार अनात्म अभिमान में होता है, वह तुच्छ है—सर्वव्यापी नहीं।
जीव इन्द्रियों की क्रिया जो अपने में मानता है और परमधर्म की