योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३०७
अपने में कल्पना करता है, वह भी तुच्छ है। वह अपने को आत्मा से भिन्न जानता है और पदार्थों को अपने से भिन्न जानता है, इस कारण विचार करने पर वरफ के हीरे की नाईं मिथ्या हो जाता है, अतः अविचार में सिद्ध है, विचार करने में नष्ट हो जाता है। पर आत्मा सब का साक्षी ज्यों का त्यों रहता है। वह अहंकार और इन्द्रियों का भी साक्षी और सर्वव्यापी है। हे राजन्! जो सत् वस्तु है, उसकी भावना कर और सम्यक्दर्शी बन। सम्यक्दर्शी को कोई दुःख नहीं होता। जैसे मार्ग में पड़ी रस्सी को रस्सी जानिये तो कोई भय नहीं और सर्प जानिये तो भय होता है। इससे सम्यक्दर्शी हो—असम्यक्दर्शी मत बन। हे राजन्! जो कुछ दृश्य पदार्थ हैं, वे सुखदायी नहीं, दुःखदायी ही हैं। जबतक इनका संयोग है, तबतक सुख जान पड़ता है, पर जब उनका वियोग होता है तब दुःख मिलता है। इससे तू उदासीन हो; किसी दृश्य पदार्थ को सुखदायी न जान और दुःखदायी भी न जान। सुख और दुःख दोनों मिथ्या हैं। इनमें आस्था मत कर अहंकार से रहित जो तेरा स्वरूप है, उसमें स्थित हो। जब अहंकार नष्ट होगा, तब अपने को जन्म-मरण विकारों से रहित आत्मा जानेगा कि मैं निरहंकार ब्रह्म चिन्मात्र हूँ। ऐसे अहंभाव से रहित होने पर अपना होना भी न रहेगा; केवल चिन्मात्र, आनन्द और राग-द्वेष के क्षोभ से रहित शान्त रूप होगा। जब अपने का ऐसा जाना, तब सोच किसका करेगा?
हे राजन्! इस दृश्य का त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो और इस मेरे उपदेश को विचार कि मैं सत्य कहता हूँ, अथवा असत्य। जो विचार में संसार सत्य हो संसार की भावना कर और जो आत्मा सत्य हो तो आत्मा की भावना कर। हे राजन्! सम्यक्दर्शी होकर सत् को सत् और असत् को असत् जान। जो असम्यक्दर्शी हैं, वे सत्य को असत्य और असत्य को सत्य मानते हैं। यथार्थ न जानने से असत वस्तु स्थिर नहीं रहती, परन्तु अज्ञानी दुःख पाता है। जैसे कोई पुरुष एक कुटी रचकर सोचने लगे कि मैंने आकाश की रक्षा की है और फिर जब कुटी नष्ट हो तब शोक करे कि आकाश नष्ट हो गया, क्योंकि