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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1116, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1116

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❇ योगवाशिष्ठ ❇

वह आकाश को कुटी के आश्रय जानता था, वैसे ही अज्ञानी पुरुष आत्मा को देह के आश्रय जानकर देह के नष्ट होने पर आत्मा का नाश मानता और दुःखी होता है। जैसे सुवर्ण में भूषण कल्पित हैं, भूषणों के नष्ट होने पर मूर्ख सुवर्ण को नष्ट मानता है; वैसे ही देह के नष्ट होने पर अज्ञानी अपने को नष्ट जानता है। पर जिसको सुवर्ण का ज्ञान है, वह भूषणों के रहते भी सुवर्ण को देखता है और भूषण संज्ञा कल्पित जानता है। अतः ज्ञानवान् आत्मा को अविनाशी और देह तथा इन्द्रियों को असत् जानता है।

हे राजन् ! तू देह और इन्द्रियों के अभिमान से रहित हो। जब अभिमान से रहित इन्द्रियों की चेष्टा करेगा, तब शुभ अशुभ कर्म तुझे बाँध न सकेंगे; और जो अभिमान सहित कर्म करेगा तो शुभ अशुभ फल को भोगेगा। हे राजन् ! जो मूर्ख अज्ञानी हैं, वे ऐसे कर्मों का आरम्भ करते हैं, जिनका कल्पपर्यन्त नाश न हो। वे देह-इन्द्रियों के अभिमान का प्रतिबिम्ब आपमें मानते हैं कि मैं करता हूँ, मैं भोगता हूँ; इससे अनेक जन्म पाते हैं, क्योंकि उनके कर्मों का नाश कभी नहीं होता और जो तत्त्ववेत्ता ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे अपने को देह और इन्द्रियों के गुणों से रहित जानते हैं और उनके संचित और क्रियमाण कर्म नष्ट हो जाते हैं। संचित कर्म वृक्ष की तरह हैं और क्रियमाण फूल-फल की तरह। जैसे रुई को लपेटकर अग्नि लगाने में वृक्ष, फूल, फल सब तृणवत् जलते हैं, वैसे ही ज्ञानरूपी अग्नि में संचित और क्रियमाण कर्म जल जाते हैं।

इससे हे राजन् ! जो कुछ चेष्टा तू वासना से रहित होकर करेगा, उसमें कोई बन्धन नहीं। जैसे बालक के अङ्ग स्वाभाविक ही भली-बुरी प्रकार हिलते हैं, उसके हृदय में अभिमान नहीं उठता, इससे उसको बन्धन नहीं; वैसे ही तू भी इच्छा से रहित होकर चेष्टा कर तो तुझे कोई बन्धन न होगा। यद्यपि सब चेष्टा तुझमें तब भी दिखेंगी तो भी वासना से रहित होगा, फिर जन्म न पावेगा। जैसे भुना बीज देखने भर को होता है और उगता नहीं, वैसे ही तुझमें सब क्रिया

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