योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३०६
देख पड़ेंगी, परन्तु जन्म का कारण न होंगी, अर्थात् पुण्यक्रिया का फल सुख न भोगेगा और पापक्रिया मे दुःख न पावेगा, किन्तु पाप-पुण्य का स्पर्श न होगा। जैसे जल में कमल स्थित होता है और उसको जल स्पर्श नहीं करता, वैसे ही पाप-पुण्य का स्पर्श तुझको न होगा। इस-लिए अहं अभिलाषा से रहित होकर जो कुछ अपना प्राकृतिक आचार है, सो कर। हे राजन् ! जैसे आकाश में जल से पूर्ण मेघ दिखते हैं, परन्तु आकाश को लिप्त नहीं करते, वैसे ही तुझको कोई कर्म बन्धन न करेगा। जैसे विष के न जाननेवाले को विष नहीं मार सकता, वैसे ही ज्ञानी को कर्म नहीं बाँध सकता।
ज्ञानवान् कर्म करके भी अपने को अकर्ता जानता है, पर अज्ञानी न करने में भी अभिमान से कर्ता होता है। जो देह और इन्द्रियों में कर्ता है और उसके अभिमान से रहित है, वह अकर्ता है। जो पुरुष इन्द्रियों का संयम करता है, पर मन में विषय के भोग की तृष्णा रखता है, जिसका अन्तःकरण राग-द्वेष से मूढ़ है और बड़े-बड़े कर्मों को करता और दुःखी होता है, वह मिथ्याचारी है। जो पुरुष हृदय में राग-द्वेष से रहित है, पर कर्म इन्द्रियों से चेष्टा करता है, वह विशेष ज्ञानी है, अपनी जान कुछ नहीं करता। वह मोक्ष पाता है। हे राजन् ! अज्ञानरूप वासना से रहित होकर विचर। जो ऐसे होकर विचरेगा सो अपने को ज्यों का त्यों आत्मा जानेगा। अपने को सदा उदयरूप, सबका प्रकाशक जानेगा और जन्म-मरण-बन्धन मुक्ति-विकार से रहित ज्यों का त्यों आत्मा भासित होगा।
हे राजन् ! उस पद को पाकर तू शांति पावेगा। अन्य सब कला विशेष अभ्यास बिना नष्ट होती हैं। जैसे रस बिना वृक्ष चाहे फैलने-वाला हो तो भी उगता नहीं। ज्ञानकला अभ्यास के बिना नहीं उपजती और उपजकर फिर नष्ट नहीं होती। जैसे धान बोते हैं तो वे दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगते हैं, वैसे ही ज्ञानकला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है। हे राजन् ! ज्ञान उपजने से जीव ऐसे जानता है कि मैं न मरता हूँ, न जन्मता हूँ; निरहंकार, निष्किंचनरूप, सबका प्रकाशक, अजर