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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1118, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1118

३१० ✺ योगवाशिष्ठ ✺

और अमर हूँ। हे राजन! ऐसी ज्ञानकला पाकर जीव मोह को नहीं प्राप्त होता। जैसे दूध मे दही बनकर वह फिर दूध नहीं होता और जैसे दूध को मथकर घृत निकालो तो फिर घृत नहीं मिलता, वैसे ही जिसकी ज्ञानकला उदय हुई है, उसे फिर मोह नहीं स्पर्श करता। हे राजन! अपने स्वरूप में स्थित होकर और को त्याग करने का नाम पुरुषप्रयत्न है। जिस पुरुष को आत्मा की भावना हुई है, वह संसार-समुद्र से पार हुआ है। पर जिसको संसार की भावना है, वह संसारी जरा और मृत्यु के दुख पाता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे परमार्थोपदेशो नाम शततमसर्गः ॥ १०० ॥

मनु बोले, हे राजन! बड़ा आश्चर्य है कि शुद्ध चिन्मात्र आत्मा में माया से नाना प्रकार के देह, इन्द्रियाँ और दृश्य भासित हुए हैं। हे राजन! दृश्य का कारण अज्ञान है। जिस आत्मा के मोहावरण अज्ञान में दृश्यरूप भासित होता है, उसी के ज्ञान से वह अज्ञान लीन हो जाता है। इस कारण इस संवेदन को त्यागकर आत्मा की भावना कर। यह में हूँ, ये मेरे हैं, ये संकल्प मिथ्या ही उठते हैं। हे राजन! प्रथम कारणरूप में एक जीव उपजा, फिर उस आदि-जीव से अनेक जीवगण हुए। जैसे अग्नि से चिनगारी निकलती है, वैसे ही उससे अनेक रूप धरे हैं। कोई गन्धर्व, कोई विद्याधर, कोई मनुष्य, कोई राक्षस इत्यादिक हुए हैं। फिर जैसे संकल्प होते गये हैं, वैसे ही रूप होते गये। वास्तव में जैसे जल में तरङ्ग स्वरूप के प्रमाद से अनेक भाव को प्राप्त होते हैं, वैसे ही अपने संकल्प अपने ही को बन्धन होते गये हैं। इससे संकल्प नानात्व की कल्पना मिथ्या है। हे राजन! इस भावना को त्यागकर आत्मपद को प्राप्त हो। आत्मा अनन्त है। यह विश्व भान और प्रकार का होता है। जैसे समुद्र सम है, पर उसमें जो कई आवर्त-तरङ्ग और बुलबुले उठते हैं, सो जल से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अनेक प्रकार का विश्व जो दिखता है सो आत्मा से भिन्न नहीं, आत्म-स्वरूप ही है। इससे आत्मा की भावना कर। कहीं ब्रह्म सत् संकल्प