योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1119, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३११
होकर स्फुरित होता है तो जानता है कि मैं ब्रह्म, शुद्धरूप और सदा मुक्तरूप हूँ और इस संसारसमुद्र से पार हो गया हूँ। जहाँ चेतनाशक्ति है, वहाँ अपने को जीता मानता है और दुःखी भी जानता है। अन्तः-करण से मिलकर भोग की भावना करना और सदा विषय की तृष्णा करना जीवात्मा का लक्षण है। जहाँ वासना क्षय हुई और शुद्ध आत्मा प्रत्यक्ष हुआ, वहाँ जीवसंज्ञा नष्ट हो जाती है और केवल शुद्ध आत्मा प्रकाश पाता है।
हे राजन्! चेतन जब अन्तःकरण से मिलकर बहिर्मुख होता है, तब संसारी होकर जग-भरण में दुःखी होता है। और जब चेतनाशक्ति अन्तर्मुख होती है; तब जन्म-मरण की भावना को त्यागकर स्वरूप की भावना करता है, जिससे सब दुःखों की निवृत्ति होती है। जब इसकी भावना स्वरूप की ओर लगती है, तब कोई दुःख नहीं रहता और जब इसे स्वरूप का प्रमाद होता है, तब यह दुःख पाता है। स्वरूप के ज्ञान में आनन्दरूप मुक्त होता है। हे राजन्! तू संसाररूपी कूप की गगरी न हो। जब गगरी रस्सी से बँधती है तो कभी ऊपर को जाती है और कभी नीचे। पर जब रस्सी टूट जाती है, तब न ऊपर को जाती है और न नीचे को। कूप क्या है, नीचे क्या है और ऊपर क्या है, यह भी सुन। हे राजन्! यह संसार ही कूप है; स्वर्गलोक ऊपर है और नरक नीचे है। जीव पुण्यकर्म से स्वर्ग को और पापकर्म से नरक को जाता है। इसी प्रकार आशारूपी रस्सी से बँधा हुआ जीव जन्ममरणरूपी चक्र में फिरता है। स्वर्ग और नरक में फिरने का कारण आशा है। जब आशा निवृत्त होती है, तब न कोई नरक है न स्वर्ग। जब तक देह में अभिमान है, तब तक नीच से नीच गति को प्राप्त होता है। जैसे पत्थर की शिला समुद्र में डालो तो नीचे से नीचे चली जाती है, वैसे ही नीच स्थानों को देखकर देहाभिमानी नीचे को चला जाता। जब इन्द्रियाँ-दिक का अभिमान त्याग करता है, तब जैसे क्षीरसमुद्र से निकलकर चन्द्रमा नीचे से ऊपर को चला गया है, वैसे ही ऊपर को जाता है।
हे राजन्! यदि आत्मा की भावना करेगा तो आत्मा ही होगा।