योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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इससे आशारूपी फाँसी को तोड़कर शान्तपद को प्राप्त हो। आत्मा चिन्तामणि की तरह है। जैसी भावना कीजिये, वैसी ही सिद्धि होती है। यदि तू आत्मभावना करेगा तो सम्पूर्ण विश्व अपने में देखेगा। जैसे पर्वत शिला और पत्थर को अपने में देखता है, वैसे ही तू भी सब को आत्मा जानेगा। हे राजन ! जो कुछ दृश्य है सो सर्वात्मा के आश्रय है। शास्त्र और शास्त्रदृष्टि सब आत्मा के आश्रय है। राजा भी आत्मा के आश्रय है। वह सर्वसत्य आत्मा चिन्तामणि कल्पवृक्ष है। जैसी कोई भावना करता है, वैसी सिद्धि होती है। हे राजन ! स्फुरण में यह सब दृश्य सत्य है। जब स्फुरण नष्ट होता है, तब न कोई शास्त्र है और न कोई दृष्टि। तब केवल अद्वैत आत्मा है; तब निषेध किसका कीजिये और अङ्गीकार किसको करिये ? जो पुरुष अहंकार से रहित हुआ है वह सर्वशास्त्र-दृष्टि पर विराजता है और सर्व आत्मा होता है। जल उर्मी को जल कहते हैं और कालवादी उर्मी को काल कहते हैं। सब का आश्रय आत्मा है। जो पुरुष देहाभिमानी है, वही मूर्ख है और स्वरूप के अज्ञान से नीचे और ऊपर के लोकों में आना जाना रहता है; पशु, पक्षी आदि की स्थावर-जङ्गम योनियाँ पाता है और आशारूपी फाँसी में बँधा हुआ दुःख को प्राप्त होता है। जो पुरुष सम्यक्दर्शी है और जिसकी शुद्ध चेष्टा है, उसको कोई विकार नहीं देख पड़ता—वह आकाश की तरह सदा निर्मल निर्लेप भासित होता है। उसको सम्पूर्ण विश्व आत्मस्वरूप दिखता है। जो चेष्टा ब्रह्मा, विष्णु और इन्द्रादिक करते हैं उसका कर्त्ता भी वह अपने को जानता है। उसके सब दुःखों का अन्त होता है, वह आत्मपद को प्राप्त होता है। उसको सब सुखों की सीमा प्राप्त होती है।
हे राजन ! जैसे नदी जब तक चलती है तब तक समुद्र को नहीं पाती; जब समुद्र को पहुँच जाती है, तब नहीं चलती, वैसे ही जब तू आत्मपद को प्राप्त होगा, तब कोई इच्छा तुझे न रहेगी। हे राजन ! तू अहंकार का त्याग कर अथवा ऐसा जान कि सब में ही हूँ। जगत्भ्रम आदिक दुःख तब तक हैं, जब तक आत्मबोध नहीं होता। जब