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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1121, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1121

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३१३

आत्मबोध होता है, तब कोई दुःख नहीं रहता। दोनों ही दुःख भारी हैं, पर ज्ञानी को इन्द्र के वज्रसमान दुःख भी स्पर्श नहीं करता। हे राजन्! जैसे पेड़ से सूखकर फल गिरता है, उसी प्रकार जब ज्ञानरूपी फल प्राप्त होता है, तब मन, बुद्धि, अहंकार पेड़ की तरह गिर पड़ते हैं। जब तक मन की चपलता है, तब तक दुःख पाता है। जब मन की चपलता निवृत्त होती है तब कोई क्षोभ नहीं रहता और शान्तपद को प्राप्त होता है। शान्ति तब होती है, जब प्रकृति का वियोग होता है। प्रकृति के संयोग से संसारी होता है और दुःख पाता है। इससे प्रकृति को त्याग दे अर्थात् अहंकार से रहित होकर चेष्टा कर।

जब तू अहंकार से रहित होगा, तब उस पद को प्राप्त होगा, जो न जड़ है, न चेतन है, न शून्य है, न अशून्य है, न केवल है; न अकेवल है। उसे न आत्मा कह सकते हैं, न अनात्मा। वह न एक है, न दो। जो कुछ नाम हैं सो प्रतियोगी से मिले हुए हैं। प्रतियोगी होकर द्वैत होता है, पर आत्मा अद्वैत है। जिसमें वाणी की गति नहीं, जो अनिर्वचनीयपद है उसको वाणी से कैसे कहिये ? जितनी नाम-संज्ञा है सो उपदेशमात्र है आत्मा अनिर्वाच्य पद है इसमें संकल्प का त्याग करके आत्मा की भावना कर। जब तू आत्मभावना करेगा, तब केवल आत्मा ही प्रकाशित होगा। जैसे फूल का कोई अङ्ग सुगन्ध से रहित नहीं होता, वैसे ही आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। हे राजन्! जब अहंकार का त्याग करेगा, तब अपने आप शोभायमान होगा और आकाश की तरह निर्मल आत्मा में स्थित होगा। अहंकार को त्यागकर उस पद को प्राप्त होगा, जहाँ शास्त्र और शास्त्रों के अर्थ नहीं पहुँचते, जहाँ सम्पूर्ण इन्द्रियों के रस लीन हो जाते हैं और सब दुःख नष्ट हो जाते हैं। तब केवल मोक्षपद को प्राप्त होगा। हे राजन्! मोक्ष किसी देश में नहीं कि वहाँ जाकर पावे; न किसी काल में ही है कि अमुक काल आवेगा तब मुक्त होगा; और मोक्ष न कोई पदार्थ ही है कि उसको ग्रहण करेगा। केवल अहंकार के त्याग से मोक्ष होता है। जब तू अहंकार का त्याग करेगा, तभी मोक्ष है। जब