योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1122, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३१४ * योगवाशिष्ठ *
तू इस अनात्म अभिमान को त्यागेगा, तब अपने आप शोभायमान होगा। जैसे धुवाँ बिना अग्नि प्रकाशमान होती है, वैसे ही अहंकार बिना तू प्रकाशित होगा। जैसे बड़े पर्वत पर निर्मल और गम्भीर तालाब सोहता है, वैसे ही तू मोहेगा। हे राजन्! तू अपने स्वरूप में स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे समाधनवर्णनं नामैकाधिकशततमस्सर्गः ॥ १०१ ॥
मनु बोले, हे राजन्! तू शुद्ध और रागद्वेष से रहित आत्माराम नित्य अन्तर्मुख रह। जब तू आत्माराम होगा, तब तेरी व्याकुलता नष्ट हो जायगी और तू शीतल चन्द्रमा सा पूर्ण हो जायगा। ऐसा होकर अपने प्रकृत आचार में विचर और किसी फल की वाञ्छा न कर। जो पुरुष वाञ्छा से रहित होकर कर्म करता है, वह सदा अकर्ता है और महा शोभा पाता है। ऐसी अवस्था में स्थित होकर जो भोजन आवे उसको खा ले और जो अनिच्छित वस्त्र आवे उसको पहन ले। जहाँ नींद आवे, वहाँ सो रह। रागद्वेष से रहित हो। जब तू ऐसा होगा, तब शास्त्र और शास्त्रों के अर्थ का उल्लंघन कर लौकिक व्यवहार करेगा। जो ऐसा पुरुष है, वह परम रस को पाकर मतवाला होता है। उसको संसार की कुछ इच्छा नहीं रहती। हे राजन्! ज्ञानवान् चाहे काशी में देह त्याग अथवा चाण्डाल के गृह में, वह सदा मुक्त है। वह सदा आत्मारूप में स्थित है। वर्तमानकाल में वह देह को नहीं त्यागता; क्योंकि जिस काल में उसको ज्ञान हुआ, उसी काल में देह का अभाव हुआ—ज्ञान से देह की बाधा हट जाती है। हे राजन्! ज्ञानवान् सदा मुक्तरूप है। वह न किसी की स्तुति करता है और न निन्दा; क्योंकि उसके चित्त की कल्पना मिट गई है। यद्यपि रागद्वेष ज्ञानवान् में भी देख पड़ते हैं और वह हँसता-रोता भी देख पड़ता है, पर उसके अन्तर में न राग है न द्वेष। वास्तव में वह न हँसता है, न रोता है—ज्यों का त्यों है। जैसे आकाश शून्यरूप है और उसमें बादल भी देख पड़ते हैं, परन्तु आकाश को वे लिप्त नहीं करते, वैसे ही ज्ञानवान् को