योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1123, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंॐ निर्वाण प्रकरण ॐ ३२५
कर्म बन्धन नहीं करता। पर अज्ञानी जानते हैं कि ज्ञानवान को क्रिया बन्धन करते हैं।
हे राजन् ! ज्ञानवान् सर्वदा नमस्कार करने और पूजने योग्य है। जिस स्थान में ज्ञानवान बैठता है, उस स्थान को भी नमस्कार है। जिससे बोलता है उस जिह्वा को भी नमस्कार है। जिस पर ज्ञानवान् दृष्टि डालता है, उसको भी नमस्कार है। वह सबका आश्रय है। हे राजन् ! जैसा ज्ञानवान् की दृष्टि से आनन्द मिलता है, वैसा आनन्द तप, दान और यज्ञ आदि कर्मों में नहीं मिलता। ऐसी दृष्टि और किसी की नहीं होती, जैसी सन्त की दृष्टि है। वह ऐसे आनन्द को पाता है, जिसमें वाणी की गति नहीं। जो पुरुष सन्त की दृष्टि को पाकर सुखी होता है, उससे लोग दुःख नहीं पाते और लोगों से वह दुखी नहीं होता। वह न किसी का भय करता है; न किसी का हर्ष करता है। हे राजन् ! सिद्धि पाने का सुख अल्प है; क्योंकि उड़ने की सिद्धि पाई तो अनेक पक्षी उड़ते फिरते हैं; इससे आत्मज्ञान तो नहीं मिलता और आत्मज्ञान बिना शान्ति नहीं होती। जब आत्मज्ञान प्राप्त होता है, तब जरा, मृत्यु आदि दुःख से मुक्त होता है और कोई दुःख नहीं रहता। जैसे पिंजड़े से छूटा सिंह फिर पिंजड़े के बन्धन में नहीं पड़ता, वैसे ही वह पुरुष अज्ञानरूपी पिंजड़े में नहीं फँसता।
हे राजन् ! इससे तू आत्मा की भावना कर, जिससे तेरे दुःख नष्ट हो जावें। अज्ञान से तुझे दुःख दिखते हैं-अज्ञान से रहित सदा आनन्द-रूप है। इससे अनुभवरूप आत्मा में स्थित हो। जब तू आत्मा में स्थित होगा तब जैसे शुद्धमणि के निकट श्वेत, रक्त, पीत, श्याम आदि रंग रखिये तो वह उनके प्रतिबिम्ब को ग्रहण करती है, पर कोई रंग उसे स्पर्श नहीं करता वे कल्पित से भासित होते हैं, वैसे ही तू प्रकृत आचार को अङ्गीकार करता रहेगा, पर तुझे पाप-पुण्य का स्पर्श न होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे मनुइक्ष्वाकुसंवादसमाप्तिर्नाम द्व्यधिकशततमसर्गः ॥ १०२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार उपदेश करके जब मनु चुप हो