योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1124, कुल 1734 में से
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गये, तब राजा ने भली प्रकार उनका पूजन किया । फिर मनु आकाश को उड़के ब्रह्मलोक गये और राजा इक्ष्वाकु राज्य करने लगा । हे राम ! जैसे राजा इक्ष्वाकु ने जीवन्मुक्त होकर राज्य किया है, वैसे ही तुम भी इस दृष्टि का आश्रय करके विचरो । राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने जो कहा कि जैसे राजा इक्ष्वाकु ज्ञान पाकर राज्य चेष्टा करते रहे, वैसे ही तुम भी करो, उसमें मेरा प्रश्न यह है कि जो अतिशय अपूर्व हो उसका पाना विशेष है और जो पूर्व में किसी ने पाया है उसका पाना अपूर्व और अतिशय नहीं; इसलिए मुझसे कहिये कि सबसे विशेष अपूर्व अतिशय क्या है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञानवान् सदा शान्तरूप और रागद्वेष से रहित है, इससे वह अपूर्व अतिशय को पाता है । जो कुछ और अतिशय है, वह पूर्व अतिशय है, पर ज्ञानवान् अपूर्व अतिशय को पाता है, ज्ञानी के सिवा अन्य कोई नहीं पाता । आत्मज्ञान को ज्ञानी ही पाता है; और वह ज्ञान एक ही है । हे राम ! जो दूसरा नहीं पाता तो अपूर्व अतिशय हुआ । हे राम ! अपूर्व अतिशय को पाकर ज्ञानवान् प्रकृत आचार और सब चेष्टा भी करता है, तो भी निश्चय सर्वदा आत्मा में रमता है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! ऐसा ज्ञानवान् जो अज्ञानी की तरह सब चेष्टा करता है, उसको किन लक्षणों से तत्त्ववेत्ता जानिये ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! एक स्वसंवेद लक्षण है और दूसरा परसंवेद लक्षण है । आप ही अपने को जाने और न जाने, इसमें स्वसंवेद कहते हैं; और जिसको और भी जानते हैं, उसे परसंवेद कहते हैं ।
हे राम ! परसंवेद के लक्षण कहता हूँ, सुनो । तप, दान, यज्ञ, व्रत इत्यादि करना परसंवेद है और दुख-सुख की प्राप्ति में धैर्य के समान रहना साधु के लक्षण हैं । महाकर्ता और महाभोक्ता और महात्यागी होना तथा क्षमा, दया इत्यादि साधु के लक्षण हैं, ज्ञानवान् के नहीं । उड़ना, छिप जाना आदि जो अणिमादिक सिद्धियाँ हैं वे भी समान लक्षण हैं । परन्तु ये स्वाभाविक आकर उपस्थित होती हैं तथा और से भी जानी जाती हैं । पर ज्ञानी के जो लक्षण हैं, वे स्वसंवेद हैं । इनके