योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1125, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें# * निर्वाण प्रकरण * ३१७
सिवा उसके सिर में सींग नहीं होते कि उनसे उसे जानिये । जैसे और व्यवहार हैं, वैसे ही उसके भी । ज्ञानी को सिद्धिसमान है । यह भी ज्ञानवान् का लक्षण नहीं । पुण्य पापादिक कर्म परमवेद हैं, सो वे माया के कल्पित हैं, ज्ञानी के नहीं होते । जितने लक्षण देखने में आयेंगे, वे मिथ्या हैं, और माया के कल्पित हैं । ज्ञानी का लक्षण स्वसंवेद है । वह सर्वदा आत्मा में स्थित और अपने आपमें सन्तुष्ट रहता है । उसे न किसी बात का हर्ष है, न शोक है । वह जन्ममरण में समान है और काम, क्रोध, लोभ, मोह सबको जानता है । उसका लक्षण इन्द्रियों का विषय नहीं; क्योंकि वह अनिर्वचनीय पद को प्राप्त हुआ है । हे राम! जिसको ज्ञान प्राप्त होता है, उसका चित्त स्वाभाविक ही विषयों में विरत होता है । वह इन्द्रियजित होता है—उसकी भोगों की इच्छा निवृत्त हो जाती है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे ज्ञानलक्षणविचारे नाम त्र्यधिकशततमस्सर्गः ॥ १०३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! मायाजाल को काटना महाकठिन है। यह आदि कलना जीव को हुई है। जो कोई इसमें सत्बुद्धि करता है, वह जैसे पखेरू जाल में फँसा हुआ निकल नहीं सकता, वैसे ही अनात्म अभिमान से निकल नहीं सकता। हे राम! फिर मेरे वचन सुनो; क्योंकि जैसे मेघ का शब्द मोर को प्रिय लगता है, वैसे ही मेरे वचन तुमको प्रिय लगते हैं। मैं भी तुम्हारे हित के निमित्त कहता और उपदेश करता हूँ। रघुकुल का ऐसा गुरु कोई नहीं हुआ, जो शिष्य का संशय निवृत्त न करे। हे राम! मेरा शिष्य भी ऐसा कोई नहीं हुआ, जो मेरे उपदेश से न जगा हो। इस निमित्त मैं तप, ध्यान आदिक को भी त्यागकर तुम्हें जगाऊँगा—इससे मैं तुमको उपदेश करता हूँ। हे राम! शुद्ध आत्मा में जो अहंभाव हुआ है, और जो कुछ अहंकार से भासित होता है वह मिथ्या है, इसमें कुछ मन नहीं। जो इसका साक्षीभूत ज्ञानरूप है, वह सत्य है, उसका कदापि नाश नहीं होता। जो वस्तु वस्तु स्फुरण से उपजी हैं, वे सब नाशवान हैं, यह