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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1126, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1126

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  • योगवाशिष्ठ *

बात बालक भी जानते हैं । जो सत्य है; वह असत्य नहीं होता और जो वस्तु असत् है, वह सत् नहीं होता । जैसे रेत में घृत निकलना असत् है, अर्थात् कदापि नहीं निकलता । जैसे एक मेढक के लाख कण करिये अथवा शिला पर घिसिये, पर जब उस पर वर्षा होती है, तब सब कण मेढक हो जाते हैं । हे राम ! तो वे मेढक तब उत्पन्न हुए जब उनमें सत्यता थी । इससे सत्य का कदापि नाश नहीं होता और असत्य का सद्भाव कभी नहीं होता ।

हे राम ! सन्ब्रह्म की भावना करो । जो ब्रह्म की भावना करता है, वह ब्रह्म ही होता है । जैसे घृत में घृत, दूध में दूध और जल में जल मिल जाता है, वैसे ही यह जीव भावना करके चिद्घन ब्रह्म के साथ एक हो जाता है, और जीवसंज्ञा निवृत्त हो जाती है । जैसे अमृत के पीने से अमर होता है, वैसे ही ब्रह्म की भावना करने से ब्रह्म होता है । जो अनात्मा की भावना करता है तो पराधीन होकर दुःख पाता है । जैसे विष के पीने से अवश्य मरता है, वैसे ही अनात्मा की भावना से अवश्य दुःख पाता है, और उसका नाश होता है, इससे आत्मभावना करो । हे राम ! जो वस्तु संकल्प से उदय होती है, वह थोड़े काल तक रहती है और जो चल वस्तु है, वह भी अवश्य नष्ट होती है । यह दृश्य आत्मा में भ्रम से सिद्ध है । जैसे मृगतृष्णा में जल, सीपी में चाँदी और आकाश में दूसरा चन्द्रमा भ्रम से सिद्ध है—वास्तव नहीं वैसे ही अहंकार-देह-इन्द्रियों में जो सुख प्रतीति होता है सो सब मिथ्या है । इससे दृश्य की भावना त्याग करके अपने अनुभवस्वरूप में स्थित हो । जब आत्मा में स्थित होगे, तब मोह को न प्राप्त होगे । जैसे पारस के स्पर्श से सुवर्ण हुआ ताँबा फिर ताँबा नहीं होता, वैसे ही तुम भी जब आत्मपद को जानोगे, तब फिर इस मोह को न प्राप्त होगे कि मैं हूँ यह मेरा है । अहं त्वं भाव तुम्हारा निवृत्त हो जावेगा और यह भावना न रहेगी ।

राम ने पूछा, हे भगवन् ! मच्छर और जूँ आदि जो पसीने में उत्पन्न होते हैं, सो सब कर्म से उत्पन्न होते हैं; देवता, मनुष्यादिक सब कर्मों से