योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1127, कुल 1734 में से
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उत्पन्न होते हैं; अथवा कर्मों के बिना भी कुछ होते हैं ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आदि परमात्मा से जो सब जीव उत्पन्न हुए हैं, वे चार प्रकार के हैं। एक तो कर्मों से उत्पन्न हुए हैं और एक कर्मों के बिना हुए हैं, एक आगे होंगे और एक अब भी उत्पन्न होते हैं। राम बोले, हे संशय-रूपी हृदय के अन्धकार को निवृत्त करनेवाले सूर्य और संदेहरूपी बादलों को निवृत्त करनेवाले पवन ! कृपा करके कहिये कि कर्मों के बिना कैसे जीव उत्पन्न होते हैं और कर्मों से कैसे उत्पन्न होते हैं ? कैसे कैसे हुए हैं, कैसे होते हैं और कैसे आगे होंगे ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा चिदाकाश अपने आपमें स्थित है। जैसे अग्नि अपनी उष्णता में स्थित है, वैसे ही आत्मा अपने स्वभाव में स्थित है। वह अनन्त और अविनाशी है—उसमें स्फुरण शक्ति स्वाभाविक स्थित है। जैसे पवन में स्पन्दन शक्ति स्वाभाविक होती है और जैसे फूलों में सुगन्ध स्वाभाविक रहती है, वैसे ही आत्मा में स्फुरण शक्ति है। हे राम ! स्फुरण शक्ति आदि में उपजी तो उस शब्द की अपेक्षा से आकाश हुआ और जब स्पर्श की अपेक्षा की, तब पवन प्रकट हुआ। इसी प्रकार पञ्चतन्मात्रा हुई। शुद्ध संवित् में जो आदि स्फुरण हुआ, उसमें प्रथम अन्तर्वाहक शरीर हुए। उनका निश्चय आत्मा में रहा कि हम आत्मा हैं और सम्पूर्ण विश्व हमारा संकल्प है।
हे राम ! उनमें से कई इस प्रकार उत्पन्न होकर अन्तर्वाहक से फिर विदेह मुक्ति को प्राप्त हुए। जैसे जल से बर्फ होकर सूर्य के तेज से शीघ्र ही फिर जल हो जाती है, वैसे ही फिर वे शीघ्र ही विदेहमुक्त हुए। कई अन्तर्वाहक से आधिभौतिक इस प्रकार हो गये कि जब तक अन्तर्वाहक में स्मरण रहा, तब तक अन्तर्वाहक रहे और जब स्वरूप का प्रमाद हुआ और संकल्प से जो पंचभूत रचे थे, उनमें दृढ़ निश्चय हुआ और जाना कि हम ये हैं, तब आधिभौतिक हो गये, जैसे ब्राह्मण शूद्रों के कर्म करने लगे और उसके निश्चय में हो जाय कि मेरा यही कर्म है। जैसे शीत के कारण जल से बर्फ हो जाती है, वैसे ही संवित् में जब दृढ़ संकल्प हुआ, तब उन्होंने अपने को आधिभौतिक जाना। हे