योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1128, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० ❇ योगवाशिष्ठ ❇
राम ! आदि परमात्मा से जो कर्म बिना उत्पन्न हुए हैं, उनका कोई कर्म नहीं; क्योंकि जो अन्तवाहक में रहे, उनकी ईश्वरसंज्ञा हुई । उनके संकल्प में जीव उपजे, उनका कारण ईश्वर हुआ और आगे जीवकल्पना में उनका स्फुरण कर्म हुआ । आगे जैसे-जैसे कर्म संकल्प में करते हैं, वैसे-वैसे शरीर रचते हैं । हे राम ! आत्मा से जो जीव उपजे हैं, वे आदि में अकारण होते हैं । जो आज उपजे हैं वे भी और जो चिरकाल से उपजे हैं वे भी । वे पीछे कर्म-वश कारण भाव प्राप्त हुए हैं ।
हे राम ! जिनका आदि स्फुरण हुआ है और स्वरूप में दृढ़ निश्चय रहा है उनकी संज्ञा पुण्य है । और जो स्वरूप को भूलकर आधिभौतिक में निश्चय करते रहे, उनकी संज्ञा घन है । हे राम ! पुण्य में घन होना सुगम है और घन में पुण्य होना कठिन है । कोई भाग्यवान पुरुष ही यत्न करके घन में पुण्यवान होता है । जैसे पर्वत से पत्थर गिरना सुगम है, वैसे ही पुण्य में घन होना सुगम है, और जैसे पत्थर को पर्वत पर चढ़ना कठिन है, वैसे ही घन में पुण्य होना कठिन है । कितने चिरकाल घन में रहते हैं और कितने यत्न करके शीघ्र ही पुण्यवान् होते हैं । हे राम ! जो सदा अन्तवाहक रहते हैं, उनकी संज्ञा ईश्वर है । जो अन्तवाहक को त्यागकर आधिभौतिक होते हैं, वे जीव कहाते हैं । वे परतन्त्र हैं-जैसे कर्म करते हैं वैसे ही शरीर पाते हैं । जो घन से पुण्य होते हैं, वे ज्ञानवान् हैं और उनका भी जन्म नहीं होता । अब भी जो प्रथम उत्पन्न होते हैं, वे कर्म बिना होते हैं और जब अपने स्वरूप से गिरते हैं, तब जैसा संकल्प करते हैं, वैसे ही शरीर पाते हैं । हे राम ! यह विश्व संकल्पमात्र है; इसमें संकल्प का त्याग करो । इस दृश्य की आस्था न करो । हे राम ! खाना, पीना इत्यादि चेष्टाएँ करो । परन्तु उनमें अहंभाव न करो । अहंकार अज्ञान से सिद्ध हुआ है, अतएव सब दृश्य मिथ्या हैं । अहंभाव के होने से जीव दुःखी होता है । इसमें अहंकार से रहित चेष्टा करो ।
हे राम ! बन्धन और मोक्ष का लक्षण सुनो । विषय और इन्द्रियों के संयोग में इष्ट में राग करना और अनिष्ट में द्वेष करना ही बन्धन