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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1129, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1129

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३२१

है । जैसे जाल में पक्षी बँध जाता है । ग्राह्य-ग्राहक इन्द्रियों के साथ विषय के सम्बन्ध में इष्ट-अनिष्ट होता है । जिसमें इन्द्रियों का संयोग होता है उसमें समबुद्धि रहे, उनके धर्म अपने में न देखे और उनका जाननेवाला जो अनुभवरूप आत्मा है उसमें साक्षीरूप होकर स्थित रहे । इस प्रकार जो इनका ग्रहण करता है, वह सदा मुक्तरूप है । जो इससे भिन्न है, वह मूर्ख जीव बन्धन में पड़ता है । तुम इस ग्राह्य-ग्राहक सम्बन्ध से सावधान रहो । इनका सम्बन्ध ही बन्धन है, और इनसे रहित होना मुक्ति । राग-द्वेष करनेवाला मन है । इस मन का त्याग करो । मन ही दुःखदायी है । जैसे कुम्हार का चक्र फिरता है और उसमें बर्तन उत्पन्न होते हैं; वैसे ही मनरूप चक्र में पदार्थरूपी बर्तन उत्पन्न होते हैं । मन के स्फुरण में संसार सत्य होता है । जब फुरना निवृत्त होगा, तब कोई दुःख न रहेगा ।

हे राम ! जब फुरने और न फुरने में समान होगे, तब राग-द्वेष से रहित होकर विचारोगे । यह हो और यह न हो; इस भावना से रहित होकर चेष्टा करो । अभिलाषापूर्वक संसार में न वासना रक्खो । हे राम ! पहले जो ज्ञानवान् हुए हैं उनको भूत की चिन्तना न थी और आगे होने की आशा भी न थी । शास्त्र के अनुसार वर्तमानकाल में वे राग-द्वेष से रहित चेष्टा करते थे । इससे तुम भी संकल्प का त्यागकर स्वरूप में स्थित होओ । हे राम ! ब्रह्मा से तृणपर्यन्त किसी पदार्थ में राग हुआ तो बन्धन है । मेरा यही आशीर्वाद है कि ब्रह्मा से तृणपर्यन्त किसी पदार्थ में तुम्हें रुचि न हो, अपने आप ही में रुचि हो । हे राम ! यह संसार मिथ्या है, इसमें कोई पदार्थ सत् नहीं है— सब मन के रचे हुए हैं । इससे मन को स्थिर करो । जैसे धोबी साबुन से वस्त्र का मैल दूर करता है, वैसे ही मन से मन को स्थिर करो । जब मन को स्वरूप में स्थिर करोगे, तब मन अपने को संकल्प का आप ही नाश करेगा । जैसे दुष्ट पुरुष की जब धन से वृद्धि होती है, तब वह अपने भाई आदि के नाश का उपाय करता है, वैसे ही मन जब आत्मपद में स्थित होता है, तब अपने संकल्प को नष्ट करता है । जब तुम्हारा मन स्वरूप में