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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1130, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1130

३२२ ✻ योगवाशिष्ठ ✻

स्थित होगा, तब तुम मनहीन अर्थात् संकल्प-विकल्प से रहित होगे और तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जावेंगे। मन के नाश बिना सुख नहीं। हे राम ! यह मन ऐसा दुष्ट है कि जिसमें उपजता है, उसी के नाश का निमित्त होता है। जैसे बाँस से अग्नि उपजकर उसी को जलाती है, वैसे ही आत्मा से उपजकर यह मन आत्मा ही को तुच्छ करता है। जैसे राजा का नौकर राजा की सत्ता पाकर राजा को ही मारकर आप राजा बन बैठता है, वैसे ही मन आत्मा की सत्ता पाकर और उसको दबाकर आप ही कर्त्ता-भोक्ता हो बैठा है। इससे मन का मन ही से नाश करो। जैसे लोहा तप कर लोहे को काटता है, वैसे ही मन से मन ही को शुद्ध करो।

हे राम ! वृक्ष, बेल, फल, फूल, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, नाग जो कुछ स्थावर-जंगम पदार्थ हैं, वे प्रथम कर्मों के बिना उत्पन्न हुए हैं। पीछे जब वे स्वरूप में मिलते हैं और घनपद को प्राप्त होते हैं, तब कर्मों से संयुक्त होते हैं। कर्मों का बीज अहंकार है और अहंकार से शरीर है। जैसे बीज से वृक्ष होता है और समय पाकर उसमें फूल व फल प्रकट होते हैं, वैसे ही अहंकार से शरीर प्रकट होते हैं। और जब अहंकार नष्ट हुआ, तब कोई शरीर नहीं—केवल आत्मपद है। अहंकार है नहीं और प्रत्यक्ष दिखाई देता है, और आत्मा अच्युत है पर गिरे की तरह भासित होता है; निराश्रय है और अवलम्ब का नाई दिखलाता है; निराकार है, पर आकार सहित लगता है; निराभास है, पर आभाससहित दिखाई देता है। इससे केवल चिन्मात्र आत्मा में स्थित होओ। यह सब चिन्मात्र रूप ही है। हे राम! जब ऐसा भासन होता है, तब चित्त अचित्त हो जाता है और जब चित्त अचित्त हुआ, तब जगत्कल्पना मिट जाती है, केवल आत्मतत्त्व ही भासित होता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कर्माकर्मविचारे नाम चतुरधिकशततमस्सर्गः ॥ १०४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस जीव के तीन स्वरूप हैं—एक स्वरूप तो शुद्धात्मा चिदानन्द ब्रह्म है, जिसमें सब प्रकट होते हैं; दूसरा अन्तः