योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
३२२ ✻ योगवाशिष्ठ ✻
स्थित होगा, तब तुम मनहीन अर्थात् संकल्प-विकल्प से रहित होगे और तुम्हारे सब दुःख नष्ट हो जावेंगे। मन के नाश बिना सुख नहीं। हे राम ! यह मन ऐसा दुष्ट है कि जिसमें उपजता है, उसी के नाश का निमित्त होता है। जैसे बाँस से अग्नि उपजकर उसी को जलाती है, वैसे ही आत्मा से उपजकर यह मन आत्मा ही को तुच्छ करता है। जैसे राजा का नौकर राजा की सत्ता पाकर राजा को ही मारकर आप राजा बन बैठता है, वैसे ही मन आत्मा की सत्ता पाकर और उसको दबाकर आप ही कर्त्ता-भोक्ता हो बैठा है। इससे मन का मन ही से नाश करो। जैसे लोहा तप कर लोहे को काटता है, वैसे ही मन से मन ही को शुद्ध करो।
हे राम ! वृक्ष, बेल, फल, फूल, पशु, पक्षी, देवता, यक्ष, नाग जो कुछ स्थावर-जंगम पदार्थ हैं, वे प्रथम कर्मों के बिना उत्पन्न हुए हैं। पीछे जब वे स्वरूप में मिलते हैं और घनपद को प्राप्त होते हैं, तब कर्मों से संयुक्त होते हैं। कर्मों का बीज अहंकार है और अहंकार से शरीर है। जैसे बीज से वृक्ष होता है और समय पाकर उसमें फूल व फल प्रकट होते हैं, वैसे ही अहंकार से शरीर प्रकट होते हैं। और जब अहंकार नष्ट हुआ, तब कोई शरीर नहीं—केवल आत्मपद है। अहंकार है नहीं और प्रत्यक्ष दिखाई देता है, और आत्मा अच्युत है पर गिरे की तरह भासित होता है; निराश्रय है और अवलम्ब का नाई दिखलाता है; निराकार है, पर आकार सहित लगता है; निराभास है, पर आभाससहित दिखाई देता है। इससे केवल चिन्मात्र आत्मा में स्थित होओ। यह सब चिन्मात्र रूप ही है। हे राम! जब ऐसा भासन होता है, तब चित्त अचित्त हो जाता है और जब चित्त अचित्त हुआ, तब जगत्कल्पना मिट जाती है, केवल आत्मतत्त्व ही भासित होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे कर्माकर्मविचारे नाम चतुरधिकशततमस्सर्गः ॥ १०४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस जीव के तीन स्वरूप हैं—एक स्वरूप तो शुद्धात्मा चिदानन्द ब्रह्म है, जिसमें सब प्रकट होते हैं; दूसरा अन्तः
- निर्वाण प्रकरण * ३२३
वाहक पुण्यनाम है, जो आत्मा के प्रमाद से हुआ है । यद्यपि केवल-पद से उत्थान हुआ है, तो भी प्रमादी नहीं, क्योंकि उसे आत्मा का स्मरण रहा है । जब आत्मपद को भूला, तब तीसरा आधिभौतिक हुआ और पञ्चतत्त्वों को अपना रूप जानने लगा । हे राम ! जीव के ये तीन स्वरूप हैं । आत्मा के प्रमाद से जीवसंज्ञा पाता है, दुःखी और परतन्त्र होता है । इससे पाञ्चभौतिक और अन्तवाहक को त्यागकर वास्तव स्वरूप में स्थित होओ । हे राम ! ये जो स्थूल और सूक्ष्म शरीर हैं, वे आत्मविचार से नष्ट हो जाते हैं । पर तीसरा जो स्वरूप है, वह सत्य है । तुम उर्मी में स्थित होओ । राम ने पूछा, हे भगवन् ! ये तीन रूप जो तुमने जीव के कहे, उनके मध्य में नाशरूप कौन है और सतरूप कौन है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! हाथ-पाँव से युक्त जो देह भोग में मिली हुई है, वह स्थूलरूप है । यह जीव अपने ही संकल्प से सदा इसका प्रमाद करता है । चित्तरूपी देह इस स्फुरणरूप से अन्त-र्वाहक है । वह सदा प्राणवायु के रथ पर स्थित रहता है—देह हो, चाहे न हो ।
हे राम ! ये दोनों शरीर उपजते और नष्ट भी होते हैं । आदि-अन्त से रहित चिन्मात्र जो निर्विकल्प है, उसे जीव का परमरूप जानो । जो तुरीयपद है, उसी में जाग्रत् आदिक उपजे हैं और उसी में लीन होते हैं । राम ने पूछा, हे भगवन् ! मैं तीन को जानता हूँ—एक जाग्रत् है जो निद्रा से रहित और जिसमें इन्द्रियाँ और चार अन्तःकरण अपने-अपने विषय को ग्रहण करते हैं । दूसरा स्वप्न है । उसमें भी इन्द्रियाँ विषय को जाग्रत् की तरह संकल्प से ग्रहण करती हैं । तीसरे में इन्द्रियाँ अपने विषय से रहित होती हैं और जड़ता आती है, तब कुछ नहीं भासित होता । शिला की तरह जड़ता तमोगुणात्मक है—यह सुषुप्ति है । इन तीनों को तो मैं जानता हूँ । अब तुरीय और तुरीया-तीत को कृपा करके कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अपना होना और न होना, दोनों को त्यागकर शेष केवल तुरीयपद रहता है । वह शान्त और निर्मलपद है । हे राम ! तुरीय जाग्रत् नहीं; क्योंकि जाग्रत्
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संकल्प-जाल है और उससे मनरूप इन्द्रियों में रागद्वेष होता है । तुरीय स्वप्न-अवस्था भी नहीं; क्योंकि स्वप्न भ्रमरूप होता है—जैसे रज्जू में सर्प भासित होता है, जो और का और होता है । तुरीय सुषुप्ति भी नहीं; क्योंकि उसमें अत्यन्त जड़ता है । तुरीयावस्था चेतनरूप, उदासीन, शुद्ध और जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से रहित है । जीवन्मुक्त तुरीयपद में स्थित रहता है ।
हे राम ! जो तुरीयपद में स्थित है, वह जगत में स्थित हुआ भी शान्त है । अज्ञानी को जगत् वज्रमयवत् दृढ़ है । ज्ञानी सदा शान्तरूप है; क्योंकि वह तीनों अवस्थाओं का साक्षी है । उसको न उनमें राग है, न द्वेष । वह उदासीन की तरह है । तुरीयातीतपद में वाणी की गति नहीं । जीवन्मुक्त पुरुष जब विदेहमुक्त होता है, तब इसी पद को प्राप्त होता है, जहाँ वाणी की भी गति नहीं । जब तक जीवन्मुक्त है, तब तक तुरीयपद में स्थित रहकर रागद्वेष से रहित होता है, और इन्द्रियाँ भी अपने विषय में राग-द्वेष से रहित होकर स्वाभाविक वरतीं हैं । जिस पुरुष को राग-द्वेष उत्पन्न होता है, वह तुरीयपद को नहीं प्राप्त हुआ और चित्त-मलिन है । जिस पुरुष को राग-द्वेष नहीं उत्पन्न होता, उसका चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है । जिसका चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है, उसको संसार की सत्यता नहीं प्रतीत होती । वह स्वप्नवत् जगत् को देखता है । इससे तुम भी सत्पद में स्थित होकर साक्षीरूप रहो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे तुरीयापदविचारो नाम पञ्चाधिकशततमस्सर्गः ॥ १०५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कर्त्ता, कारण और कर्म, ये तीनों हों, पर तुम इनके साक्षी होओ । इनका कर्तृत्व-अभिमान तुम्हें न हो कि मैं यह करता हूँ, अथवा मैंने इसका त्याग किया है । इनमें उदासीन होकर तटस्थ रहो । इसी पर एक आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो । तुम प्रबुद्ध हो तो भी दृढ़ बोध के निमित्त सुनो । हे राम ! एक बन में काष्ठमौन-नामक एक मुनि रहता था । एक दिन एक बधिक किसी
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ۳۲۵
मृग पर बाण चलाता हुआ उसके पीछे दौड़ता जाता था। जब वह आगे गया तो मृग बधिक की दृष्टि से ओझल हो गया। बधिक ने देखा कि एक तपस्वी बैठा है तो उसने पूछा, हे मुनीश्वर ! यहाँ एक मृग आया था, वह किस ओर गया ? तुमने देखा हो तो मुझसे कहो। काष्ठमौन बोले, हे बधिक ! हमको कुछ सुध नहीं, क्योंकि हम निरहंकार हैं। हमारे साथ चित्त और अहंकार, दोनों नहीं। जो तुम कहो कि इन्द्रियों की चेष्टा कैसे होती है तो जैसे सूर्य के आश्रय से लोगों की चेष्टा होती है या दीपक के आश्रय से चेष्टा होती है और सूर्य व दीपक केवल साक्षी है, वैसे ही हम इन्द्रियों के साक्षी हैं और इनकी चेष्टा स्वाभाविक होती है। हमको इनसे कुछ प्रयोजन नहीं।
हे बधिक ! अहंभाव करनेवाला अहंकार है। जैसे माला के भिन्न-भिन्न दाने तागे के आश्रित होते हैं और सब में एक तागा होता है, तब माला होती है, पर जब तागा टूट जाता है, तब दाने अलग-अलग हो जाते हैं, वैसे ही इन्द्रियाँ दाने हैं और अहंकार तागा है। उस अहंकाररूपी तागे के टूटने से इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न हो जाती हैं। जैसे राजा का नाश होने पर सेना और गोपाल के नष्ट होने पर गौवें बिखर जाती हैं और पिता के नष्ट होने पर बालक व्याकुल होते हैं, वैसे ही अहंकार के बिना इन्द्रियाँ विकल होती हैं। इनका अभिमान मुझमें कुछ नहीं। इनका अभिमानी अहंकार था, वह मेरा अभिमान नष्ट हो गया है। इन्द्रियाँ अपने अपने विषय में विचरती हैं। मुझको इनका न राग है, न द्वेष। हे साधो ! मुझे न जाग्रत, न स्वप्न, न सुषुप्ति है। इन तीनों से रहित मैं तुरीयपद में स्थित हूँ। मेरा अहं-त्व मिट गया है। मैं नहीं जानता कि मृग बायें गया या दाहिने; क्योंकि चक्षु इन्द्रिय देखनेवाली है, उसमें बोलने की शक्ति नहीं। ये इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं। एक इन्द्रिय को दूसरी की शक्ति नहीं; फिर तुमसे कौन कहे ? इन सबको रखनेवाला अहंकार था, जो सबको अपना जानता था। जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट होते हैं, वैसे ही अहंकार के नष्ट होने से मैं स्वच्छ, निर्मल, शान्त तुरीयपद में स्थित हूँ। इन्द्रियों
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का बीज अहंकार मृतक हो जाने से इन्द्रियाँ भी मृतक हो गई हैं, देखने भर को देख पड़ती हैं। जैसे भीत पर लिखी पुतलियों से कार्य कुछ नहीं होता, वैसे ही मेरी इन्द्रियों से कुछ कार्य नहीं होता । तब तुझसे कौन कहे।
वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र ! जब इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा, तब वधिक समझकर उठ गया। हे राम ! तुरीयपद शान्तरूप है। वहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों का अभाव है। वह केवल अद्वैतपद है। ये जो ब्रह्म, आत्मा, चिदानन्द आदि संज्ञाएँ हैं, सो तुरीयपद में हैं। तुरीयातीतपद में शब्द की गति नहीं। वह अशब्द पद है। विदेह पुरुष उसी पद को प्राप्त होते हैं और जीवन्मुक्त साक्षात् करके तुरीयावस्था में विचरते हैं। वहाँ जाग्रत, जो दीर्घ दुःख-सुख का भान है, सो नहीं; स्वप्न जो राग-द्वेष के लिए अल्पकाल है, वह भी नहीं; जड़ता या नामरूप अवस्था भी नहीं। तुरीयपद इन तीनों से रहित और शान्त है। उसमें कोई क्षोभ नहीं। यह जगत् उसका आभास है। जैसे समुद्र में तरङ्ग वास्तव में कुछ नहीं, जल ही है, वैसे ही केवल तुरीयस्वरूप सत्तासामान्य तुम्हारा स्वरूप है। उसमें स्थित होओ। उसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सिद्ध, ज्ञानी इत्यादिक स्थित हैं और काष्ठमौन वधिक का उपदेश करनेवाला मुनि भी तुरीयपद में स्थित था। उसकी विशेषकल्पना, जो भिन्न-भिन्न नामरूप को देखनेवाली थी, निवृत्त हुई थी। वह केवल सत्तासामान्य में स्थित था। इससे कलना को त्यागकर तुम भी तुरीयपद में स्थित हो रहो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे काष्ठमौनवृत्तान्तवर्णनं नाम षडधिकशततमस्सर्गः ॥ १०६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह विश्व केवल आकाशरूप है। यह आत्मा से भिन्न नहीं; आत्मा का ही चमत्कार है। जैसे मेघ में बिजली का चमत्कार होता है, वैसे ही यह विश्वरूप चित्कला आत्मा का चमत्कार है। हे राम ! वास्तव में सब ब्रह्म ही है, भिन्न कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह विश्व आपने ब्रह्मरूप कहा है—मेघ में
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३२७
बिजली की तरह यह क्षण में उपजता और क्षण में लीन होता है। पर मेघ में बिजली दिखती है। जहाँ मेघ होता है, वहाँ बिजली भी होती है, इससे मेघ में बिजली उत्पन्न हुई तो उसका कारण मेघ है। हे मुनी- श्वर ! इस चित्तस्पन्दन कला के कारण की उत्पत्ति ब्रह्म में कैसे हुई है यह कृपा करके मुझसे समझाकर कहिये ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जो वितंडास्वरूप तुम तर्क करते हो, सो कुछ नहीं—इस नष्ट-बुद्धि को त्यागो। यह तो बालक भी जानते हैं कि बिजली क्षणभंगुर है, सत्य नहीं। तुम्हारा और क्या प्रयोजन है, सो कहो। यह कारण-कार्यरूप का तर्क कैसा करते हो ? राम बोले, हे भगवन् ! यह स्पन्दनकला सत्य है या असत्य ? इसका कारण कौन है, जिससे यह उठती है ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! सब प्रकार से सर्वात्मा ही स्थित है। चित्त और चित्तस्पन्दन, यह भेदकल्पना वास्तव में कुछ नहीं। ब्रह्म ही अपने स्वरूप में आप स्थित है। और सब भ्रम से भाषित होते हैं। जैसे भ्रमदृष्टि से आकाश में मोती दिखते हैं और नेत्र मूँदकर खोलो तो तरुवर प्रतीति होते हैं, वैसे ही यह जगत् भ्रम से भाषित होता है। हे राम ! हम इस संसारसमुद्र के पार हुए हैं। हम सदृश ज्ञानवानों के यथार्थ वचन सुनकर हृदय में धारण करो तो शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति हो। और जो मूर्खता करके मेरे वचनों को न धारण करोगे तो तुम्हारे दुःख न नष्ट होंगे और वृक्ष, तृण, बेल आदि की योनि पाओगे। हे राम ! आकाश और काल आदि सब पदार्थ कल्पना से सिद्ध हुए हैं— आत्मा में कोई नहीं। हे राम ! वायु से रहित जो समुद्र का चञ्चलभाव है, उसका कारण कौन है ? दीपक में जो प्रकाश और अग्नि में उष्णता है, उस प्रकाश और उष्णता का कारण कौन है ? वायु के निस्पन्द और स्पन्द का कारण कौन है ? जैसे इनका कारण कोई नहीं, वायु का रूप ही स्पन्द निःस्पन्द है, अग्नि का रूप उष्णता है और दीपक का रूप प्रकाश है, वैसे ही कल्पना भी आत्मस्वरूप है— भिन्न नहीं।
हे राम ! यह कल्पना जो तुमको भाषित होती है, उसको त्याग
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करोगे। तब अपने आपको देखोगे, तब संशय मिट जावेंगे। जैसे जब प्रलयकाल का जल बढ़ता है, तब सब जलमय हो जाता है—कुछ जल से अलग नहीं होता, वैसे ही अपने स्वरूप को जब तुम देखोगे, तब तुमको सब आत्मा ही दिखेगा—आत्मा से भिन्न कुछ न नजर आवेगा। हे राम! आत्मा एकरस है, सम्यक्दर्शन में ज्यों का त्यों और असम्यक्दर्शन में और का और दिखेगा। जैसे रज्जू को यथार्थ न देखिये तो सर्प का भ्रम और भय होता है, और जब ज्यों की त्यों रज्जू जान लो तब सर्प का भ्रम निवृत्त हो जाता है, वैसे ही आत्मा के न जाने से जीव संसारी होता है, भयभीत होता है, अपने को जन्मता-मरता मानता है और देह के सब विकार आत्मा में जानता है। पर जब आत्मा को जानता है, तब सब भ्रम निवृत्त हो जाते हैं। जैसे नेत्रों में तारे दीखते हैं और जब नेत्र मूँद लो तो उनका आकार अन्तःकरण में भासित होता है, क्योंकि उनकी सत्यता हृदय में होती है—पर जब हृदय से उनकी सत्यता उठ जाती है, तब फिर नहीं भासित होते, वैसे ही चित्त के भ्रम से संसार हुआ है, उसको मिथ्या जानो। हे राम! स्फुरण में जो दृढ़भावना हुई है, वही सत्य होकर मिथ्या संसार हुआ है। जब चित्त का त्याग करोगे, तब संसार की सत्यता जाती रहेगी।
रामजी बोले, हे भगवन्! आपने जो कहा कि यह विश्व कल्पनामात्र है सो मैंने जाना कि इसी प्रकार है—वह सत्य नहीं। जैसे राजा लवण, इन्द्र, ब्राह्मण के पुत्र और शुक्र की कल्पना जब स्फुरण से दृढ़ हुई तब उन्हें स्फुरणरूप विश्व सत्य देख पड़ा और सत्य जान पड़ने लगा। हे भगवन्! यह मैं जानता हूँ कि विश्व वासना का स्फुरणमात्र है। जब स्फुरण मिट जाता है, तब उसके पीछे जो शान्ति रूप शेष रहता है, उसे अब कहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम! अब तुम सम्यक् बोधवान् हुए हो और जो जानने योग्य है, वह तुमने जाना है। हे राम! अध्यात्मशास्त्र का यह सिद्धान्त है कि और सब दृश्य असम्भव है, एक चिद्घन ब्रह्म अपने में आप स्थित है। हे राम! आत्मा शुद्ध, निर्मल और विद्या-अविद्या से रहित है। उसमें संसार का अत्यन्त
⚙️ निर्वाण प्रकरण ३२६
अभाव है। जो कुछ शब्द आदिक संज्ञाएँ हैं, वे भी स्फुरण में हैं; आत्मा तो अनिर्वचनीयपद है। उसकी इतनी संज्ञा शास्त्रकारों ने कही हैं—शून्यवादी उसी को शून्य कहते हैं; विज्ञानवादी विज्ञानरूप कहते हैं; उपासनावाले उसी को ईश्वर कहते हैं। कोई कहते हैं कि आत्मा सबका कारण है, वही शेष रहता है। कोई आत्मा को सर्वशक्तिमान् कहते हैं। कोई कहते हैं कि आत्मा निःशक्ति है। कोई साक्षी आत्मा और शक्ति को भिन्न मानते हैं।
हे राम ! जितने वाद हैं, वे सभी कल्पना से हुए हैं। कल्पना को मानकर ही सब वाद उठाते हैं। वास्तव में कोई वाद नहीं। आत्मा निर्वाच्यपद है। मेरा जो सिद्धान्त है, वह भी सुनो। आत्मा सब कलनाओं से अतीत है। जैसे पवन स्पन्दनशक्ति से उठता है और निस्पन्द से ठहर जाता है—क्योंकि स्पन्दन भी पवन है और निस्पन्द भी पवन है, इतर कुछ नहीं—वैसे ही आत्मा शुद्ध अद्वैतरूप है, और कलना भी आत्मा के आश्रय से होती है; आत्मा से भिन्न नहीं है। और जो भिन्न प्रतीत होती है, उसको मिथ्या जानकर त्यागो, और अपने निर्विकार स्वरूप में स्थित रहो। जब तुम आत्मस्वरूप में स्थित होगे, तब जितने शास्त्रों के भिन्न-भिन्न मतवाद हैं, वे कोई न रहेंगे; केवल अपना आप स्वच्छ आत्मा ही भासित होगा। हे राम ! उस निर्विकल्पपद को पाकर तुमने शान्ति पाई है। तुम असत् की तरह स्थित हुए हो; क्योंकि द्वैतकलना नहीं फुरती। हे राम ! आत्मा, ब्रह्म आदि शब्द भी उपदेश के लिए कहे हैं। आत्मा तो शब्द से अतीत है। यह सब जगत् आत्मस्वरूप है और संसाररूप विकार आत्मा में असम्यग्दर्शन से प्रतीत होते हैं। जैसे शून्य आकाश में तारे मोती सदृश भासित होते हैं, सो अविदित हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् द्वैत अविदित भासित होता है। इससे जगत् द्वैत की भावना त्यागकर निर्विकल्प आत्मस्वरूप में स्थित रहो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अविद्यानाशरूपवर्णनं नाम सप्ताधिकशततमस्सर्गः ॥ १०७ ॥
३३० | योगवाशिष्ट
राम ने पूछा, हे भगवन् ! देह, इन्द्रिय और कल्पना में सार वस्तु क्या है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो कुछ यह अहं-त्व आदि दृश्य जगत् है, सो सब चिन्मात्र है। जैसे समुद्र जलमात्र ही है, वैसे ही जगत् चिन्मात्र है। मनसहित षट् इन्द्रियों में जो कुछ दृश्य प्रतीत होता है, सो ब्रह्ममात्र है। हे राम ! देह, इन्द्रिय आदि सब मिथ्या हैं; आत्मा में ये कोई नहीं हैं। चित्त के द्वारा कल्पित हैं और चित्त ही इनको देखता है। जैसे मरुस्थल में मृग को जलबुद्धि होती है तो जल के निमित्त दौड़कर दुःख पाता है, वैसे ही चित्तरूपी मृग आत्मरूपी मरुस्थल में देह-इन्द्रिय-विषयरूपी जल की कल्पना कर दौड़ता है और दुःख पाता है। ये देह और इन्द्रियाँ भ्रम से भासित होते हैं। जैसे मूर्ख बालक परछाहीं में वेताल की कल्पना करता है, वैसे ही मूर्ख चित्त ने देह-इन्द्रियादि की कल्पना की है। हे राम ! आत्मा शुद्ध, निर्विकार है। उसमें चित्त ने भ्रम से विकार आरोपित किये हैं। जैसे भ्रान्त दृष्टि में आकाश में दो चन्द्रमा दिखते हैं, वैसे ही चित्त ने देह-इन्द्रिय आदि की कल्पना की है। पर चित्त भी सत्य नहीं है; आत्मा की सत्ता लेकर चेष्टा करता है। जैसे चुम्बक की सत्ता लेकर लोहा चेष्टा करता है, वैसे ही निर्विकार आत्मा की सत्ता लेकर चित्त नाना प्रकार के विकारों की कल्पना करता है। इससे चित्त का त्याग करो, जिससे तुम्हारा विकार-जाल मिट जावे।
हे राम ! देह-इन्द्रियों में सार क्या है, सो सुनो। जो कुछ संसार है, उसका सार देह है; क्योंकि सब देह के सम्बन्धी हैं। जब देह मिट जाता है, तब सम्बन्धी भी नहीं रहते। देह का सार इन्द्रियाँ हैं, इन्द्रियों का सार प्राण है; प्राणों का सार मन है और मन का सार बुद्धि है। बुद्धि का सार अहंकार है, अहंकार का सार जीव है, जीव का सार चिदावली है। चिदावली वासना-संयुक्त चेतना को कहते हैं। चिदावली का सार चित्त से रहित शुद्ध चैतन्य है, जिसमें सब विकल्प लय हो जाते हैं। जो शुद्ध, निर्मल और चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है, उसमें कोई उत्थान नहीं। हे राम ! चिदावली पर्यन्त सबको त्यागकर इनका जो सार चैतन्य
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३३१
आत्मा है, उसमें स्थित होओ। विश्व-कल्पनामात्र है, आत्मा में कुछ नहीं। यह विश्व संकल्प की दृढ़ता से सत् की तरह जान पड़ता है। पहिले भी शुक्र, लवण राजा और इन्द्र के पुत्रों के वृतान्त में कहा है कि संकल्प से जो उन्हें जगत् दृढ़ होकर भासित हुआ था, सो वास्तव में कुछ नहीं था। वैसे ही यह विश्व भी चित्त के फुरने में स्थित है। असम्यकदृष्टि से अद्वैत आत्मा में दृश्य भासित होता है। जैसे सूर्य की किरणों में जल जान पड़ता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार आदिक अज्ञान से दृश्य भासित होते हैं। इससे इनको त्यागकर अपने वास्तव स्वरूप में स्थित होओ। हे राम! एक गढ़ तुमको बताता हूँ, जिसमें किसी शत्रु की गति नहीं। उसमें स्थित होओ। हम भी उसी गढ़ में स्थित हैं; और जितने ज्ञानवान् हैं, वे उसी में स्थित होते हैं।
हे राम! काम, क्रोध, लोभ, अभिमान आदिक विकार आत्मा में नहीं पाये जाते। जैसे रात्रि में दिन नहीं होता, वैसे ही विकाररूपी दिन गढ़रूपी रात्रि में नहीं पाया जाता। इससे अचिन्त्यरूप गढ़ में, जहाँ कोई फुरना नहीं और जो केवल शान्तरूप है, अहंभाव त्यागकर स्थित होओ तो अहं-त्वं भाव निवृत्त हो जावै। जब स्वरूप का साक्षात्कार होता है, तब ज्ञानी फुरने और न फुरने में स्वरूप को समान देखता है और सम्पूर्ण जगत् उसको आत्मरूप दिखता है। इससे चिदावली से देह पर्यन्त जो अनात्म है, उसको क्रम-क्रम से त्यागो। प्रथम देह को त्यागो, फिर इन्द्रियों के अभिमान को त्यागो। इसी क्रम से सबको त्यागकर अपने वास्तवस्वरूप में स्थित होओ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जीवत्वाभावप्रतिपादनं नामाष्टाधिकशततमस्सर्गः ॥ १०८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार चेतनमात्र है। आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। आत्मा ही विश्वरूप होकर स्थित है। जैसे सूर्य की किरणें ही जल का आभास होती हैं, वैसे ही आत्मा का चमत्कार दृश्यरूप होकर स्थित है। जैसे संकल्प और संकल्प करनेवाला भिन्न नहीं और आकाश ही भ्रम से मोती की माला होकर भासित होता है, वैसे ही आत्मा ही
३३२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
दृश्यरूप होकर भासित होता है । जैसे बीज ही वृक्ष, फूल और फल होता है, वैसे ही विश्व आत्मा ही है और दृश्यरूप होकर स्थित है । जैसे जल के तरंग जल ही हैं, वैसे ही विश्व आत्मा ही है । हे राम ! चिदावली, जीव, अहंकार, बुद्धि, प्राण, इन्द्रिय, देह, विश्व, आकाश, काल, दिशा, पदार्थ, सब कुछ आत्मा ही है, आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । इससे विश्व को अपना स्वरूप जानो । जैसे सूर्य का प्रकाश सूर्य ही है, वैसे ही तुम जानो कि सब मैं ही हूँ । जो ऐसे न जान सको तो ऐसे जानो कि देह भी जड़ है और इन्द्रियों से पालित है; वह देह मैं नहीं हूँ । इन्द्रियाँ भी मैं नहीं, क्योंकि प्राण इन्द्रियों का सार है । जो प्राण न हो तो इन्द्रियाँ किसी काम की नहीं ।
प्राण भी मैं नहीं; क्योंकि प्राण का सार मन है । जो मन मूर्च्छित होता है और प्राण (साँस) आते-जाते भी हैं तो भी किसी काम के नहीं । मन भी मैं नहीं; क्योंकि मन को प्रेरणावाली बुद्धि है । जो निश्चय बुद्धि करती है, मन भी वहीं जाता है । बुद्धि भी मैं नहीं; क्योंकि बुद्धि का प्रेरक अहंकार है । अहंकार भी मैं नहीं; क्योंकि अहंकार का सार जीव है । जीव के बिना अहंकार किसी काम का नहीं । जीव भी मैं नहीं; क्योंकि जीव का सार चिदावली है । शुद्ध चित् में चैतन्यो-न्मुखत्व होने को चिदावली कहते हैं । जीवसंज्ञा से प्रथम ईश्वरभाव चिदावली भी मैं नहीं; क्योंकि चिदावली का सार चिन्मात्र है और वह अद्वितीय निर्विकल्प स्वरूप है । ये सब अनात्मभ्रम से सिद्ध हुए हैं, मैं केवल शान्तरूप आत्मा हूँ । हे राम ! जो तुम्हारा वास्तवस्वरूप है, वही होकर रहो । अपने भिन्न अनात्म में अहं-प्रीति को त्याग दो । तुम देह से रहित निर्विकार हो, तुममें जन्म-मरणादिक कोई विकार नहीं और तुम शान्तरूप ज्यों के त्यों स्थित हो । तुम कर्ता स्वरूप में और नहीं हुए-उसी स्वरूप में स्थित रहो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सार पयोधनं नाम नवा-धिकशततमस्सर्गः ॥ १०९ ॥
वसिष्ठजी बोले, हे राम ! आत्मा चिन्मात्र से बढ़कर और सार कुछ
❁ निर्वाण प्रकरण ❁ ३३५
नहीं। उसी में स्थित रहो, जिससे सब ताप मिट जावें। हे राम! सर्वत्र आत्मा ही स्थित है। जैसे बीज ही फलफूल होकर स्थित होता है, वैसे ही सब कुछ आत्मा में ही स्थित है। तब निषेध और त्याग किसका करिये? इतना कह वाल्मीकिजी बोले, हे शिष्य! वशिष्ठजी के वचन सुन रामजी प्रसन्न हुए। जैसे कमल सूर्य को देखकर खिल जाता है, वैसे ही रामजी की बुद्धि वशिष्ठजी के वचनरूपी सूर्य से खिल उठी। तब वह बोले, हे भगवन् सर्वधर्मज्ञ! आपकी कृपा से अब मैं जगा। बड़ा आश्चर्य है कि आत्मा सर्वदा अनुभवरूप और अपना रूप आप है, पर उसके प्रमाद से मैंने इतने काल तक दुःख पाया। अहंता और ममतारूपी बड़ा बोझ जो सिर पर था, उससे मैं दुःखी था। जैसे किसी के सिर पर पत्थर की शिला हो और ज्येष्ठ-आषाढ़ की धूप में वह पैदल चले तो दुःख पाता है, और जो उसके सिर से कोई उस शिला को उतार ले और छाया में बैठाये तो बड़े सुख को प्राप्त होता है, वैसे ही अज्ञानरूपी धूप में अहंताममतारूपी शिला के बोझ से मैं दुःखी था, आपने वचनरूपी बल से उस शिला को उतार लिया और आत्मरूपी वृक्ष की छाया में विश्राम कराया।
हे भगवन्! अब मुझे शान्तिपद प्राप्त हुआ है और मेरे तीनों ताप मिट गये हैं। अब जो सुमेरु पर्वत का भार भी आ पड़े तो भी मुझे कोई कष्ट नहीं। अब मेरे सब संशय निवृत्त हुए हैं। जैसे शरत्काल का आकाश निर्मल और स्वच्छरूप होता है, वैसे ही रागद्वेषरूपी मेरा द्वन्द्व नष्ट हो गया। अब मैं अपने स्वभाव में स्थित हूँ। परन्तु एक प्रश्न है, कृपा करके उसका उत्तर दीजिये। महापुरुष बारम्बार प्रश्न करने से बुरा नहीं मानते। हे भगवन्! आप कहते हैं कि सब ब्रह्म ही है तो शास्त्र का यह विधि-निषेध और उपदेश किसके लिए है कि यह कर्म कर्तव्य है और यह कर्म कर्तव्य नहीं।
वशिष्ठजी बोले, हे राम! आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। विश्व भी उसका चमत्कार है। जैसे समुद्र में पवन से नाना प्रकार के तरङ्ग उठते हैं, पर जल से वे भिन्न नहीं, वैसे ही चैतन्य आत्मा में अहंभाव को
३४४ ॠ योगवाशिष्ठ ॠ
लेकर चैतन्यान्मुखत्व उपजा है। उसमें देश, काल, वस्तु बन गये हैं और शास्त्र निकले हैं। फिर फुरने में उसके दो रूप—हुए हैं एक विद्या और दूसरा अविद्या। उसमें विद्यारूप जो जीव हुए हैं, वे ईश्वर कहलाते हैं और अविद्यारूप जीव हैं, जिनको अपने स्वरूप में अहं प्रत्यय वास्तव रहा है, वे ईश्वर हैं, और जिनका स्वरूप का प्रमाद हुआ और जो संकल्प-विकल्प में बहते हैं, वे जीव दुखी हैं।
हे राम ! इतनी संज्ञा फुरने में हुई है, तो भी आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। जैसे एक ही रस फूल, फल और वृक्ष हुआ है, रस से भिन्न कुछ नहीं। आत्मा रस की तरह भी परिणाम को नहीं प्राप्त हुआ। फुरने में ईश्वर-जीव और विद्या-अविद्या हुए हैं—आत्मा में कुछ नहीं। हे राम ! जिनका संकल्प आधिभौतिक में दृढ़ नहीं हुआ, वे जीव शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त होते हैं और उनको आत्मा का साक्षात्कार भी शीघ्र ही होता है। जिसका संस्कार आधिभौतिक में दृढ़ हुआ है, वे चिरकाल में आत्मपद को प्राप्त होते हैं। आत्मपद की प्राप्ति बिना वे दुःख पाते हैं। जिनको आत्मपद की प्राप्ति होती है, वे सुखी होते हैं।
हे राम ! ज्ञानी और अज्ञानी के स्वरूप में और कुछ भेद नहीं, केवल सम्यक् और असम्यक् दर्शन का भेद है। हे राम ! विद्या भी दो प्रकार की है—एक ईश्वरवाद और दूसरा अनीश्वरवाद है। जो ईश्वरवादी हैं, वे तुरीयपद को प्राप्त होते हैं, और जो अनीश्वरवादी हैं, उनको जब ईश्वर की भावना होती है, तब वे शास्त्र और गुरु द्वारा ईश्वर को प्राप्त होते हैं। ईश्वरवादी भी दो प्रकार के हैं—एक वे जो और वासना त्यागकर ईश्वरपरायण होते हैं, वे शीघ्र ही ईश्वर को प्राप्त होते हैं। आत्मा ही ईश्वर है, जो सबका अपनारूप है। दूसरे प्रकार के जीव ईश्वर को मानते हैं, पर उनकी वासना संसार की ओर होती है। वे चिरकाल में आत्म-पद को प्राप्त होते हैं। अनीश्वरवादी भी दो प्रकार के हैं--एक कहते हैं कि कुछ होगा। उनको होते-होते की भावना में शास्त्र और गुरु के द्वारा आत्मपद की प्राप्ति होगी। दूसरे कहते हैं कि कुछ नहीं है। उनको चिरकाल में जब आस्तिक भावना होगी, तब वे आत्मपद को प्राप्त होंगे।
❁ निर्वाण प्रकरण ❁ ३३५
हे राम ! उनके निमित्त विधि और निषेध कहे हैं कि शुभकर्म को अङ्गी- कार करो और अशुभ कर्म त्यागो। उससे जब अन्तःकरण शुद्ध होगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी। जो विधि-निषेध शास्त्र न कहें तो बड़ा छोटे को खा जाय। इस निमित्त शास्त्र का दण्ड है। हे राम ! स्वरूप से किसी को उपदेश नहीं, भ्रम में उपदेश है। जिस पुरुष का भ्रम निवृत्त हुआ है, वह फिर मोह में नहीं डूबता—जैसे जल में डूबा फिर नहीं डूबता। जिसका चित्त वासना से घिरा हुआ जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा है, उसका इस संसार से निकलना कठिन है। जैसे उजाड़ के कुएँ में गिरकर निकलना कठिन होता है, वैसे ही चित्त से मिलकर संसार से निकलना कठिन होता है।
हे राम ! इस चित्त को स्थिर करो, जिससे तुम्हारे दुःख मिट जावें और सत्तासमान पद को प्राप्त होओ।
हे राम ! जिसको आत्मा का साक्षात्कार हुआ है और अनात्म में अहं-प्रत्यय निवृत्त हुआ है वह पुरुष जो कुछ करता है; उसमें नहीं बँधता। वह अपने को सदा अकर्ता देखता है। जिसको अनात्मा में अहं- प्रत्यय है, वह सदा पुरुष करे तो भी कर्ता है और जो न करे तो भी कर्ता है। हे राम ! जो अज्ञानी शुभ कर्म करता है वह शुभ कर्म करता हुआ स्वर्ग को प्राप्त होता है, और अशुभ कर्म करने से नरक को प्राप्त होता है। जो शुभ कर्म को त्यागता है तो भी नरक को प्राप्त होता है; क्योंकि उसे अनात्म में आत्म अभिमान रहता है। इससे बुद्धि का निग्रह करो और इन्द्रियों से चेष्टा करो। देखने, सुनने, सूँघने को मैं तुम्हें नहीं वर्जता, मैं यही कहता हूँ कि अनात्म में अभिमान को त्यागो। जब अनात्म के अभिमान को त्यागोगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। तब जहाँ तुम्हारा चित्त जायगा, वहाँ आत्मा ही भासित होगा—आत्मा से भिन्न कुछ न भासित होगा। इससे चित्त को त्यागो और आत्मपद में स्थित हो। चित्त अहंभाव का नाम है। जैसे विश्व की उत्पत्ति हुई है, सो भी सुनो। शुद्ध चैतन्यमात्र में चिदावलीरूप अहंतरङ्ग उठा है। उस चिदावलीरूप समुद्र में जीवरूपी तरङ्ग उपजता है और जीवरूपी
३३६ # योगवाशिष्ठ
समुद्र में अहंरूपी तरङ्ग भासित हुआ है । अहंकाररूपी समुद्र में बुद्धिरूपी तरङ्ग उपजा है । बुद्धिरूपी समुद्र में चित्तरूपी तरङ्ग उठा है और चित्तरूपी समुद्र में संकल्परूपी तरङ्ग उपजा है । उस संकल्परूपी समुद्र में जगतरूपी तरङ्ग उपजा है और जगतरूपी समुद्र में देहरूपी तरङ्ग भासित हुआ है । उसके संयोग से दृश्य का ज्ञान हुआ कि यह पदार्थ है, यह नहीं है, ये ऐसे हैं । उसी से देश, काल, दिशा सब हुए हैं ।
हे राम ! निदान ये सब संकल्प से ही गये हैं । अतएव आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । केवल शान्तरूप एकरस आत्मा है । उसमें नाना प्रकार के आचार रचे हैं । जैसे स्वप्न की सृष्टि जो नाना प्रकार की दिखती है, सो अपना ही अनुभव होता है, वैसे ही इस जगत को भी जानो । आत्मा सर्वदा एकरस, अद्वैत, शुद्ध, परम निर्वाण, अपने आप में स्थित है । उसके फुरने से नाना प्रकार की कल्पनाएँ उदय हुई हैं । हे राम ! शुद्ध आत्मा में चिदेव संज्ञा भी संकल्प से हुई है—"चिदेव पञ्चभूतानि; चिदेव भुवनत्रयम्" । आत्मा अनिर्वाच्यपद है । उसमें वाणी की गति नहीं । वह शुद्ध शान्तरूप है । चिदेव जो स्फुरित है, उस स्फुरण से संसार हुआ सा स्थित है । जैसे एक ही बीज ने वृक्ष, फूल, फल आदि संज्ञाएँ पाई हैं, पर वह बीज से भिन्न कुछ नहीं । पर आत्मा बीज की तरह भी नहीं, संकल्प से ही नाना संज्ञाएँ हुई हैं और जगत् स्थित है । तो भी आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । जैसे वायु चलती है तो भी वायु है और ठहरती है तो भी वायु है, वैसे ही आत्मा में नानात्व कुछ नहीं, वह केवल शुद्ध अद्वैत है । आत्मरूपी समुद्र में नाना प्रकार के विश्वरूपी तरङ्ग स्थित हैं । हे राम ! आकार भी आत्मा से भिन्न नहीं, जो आत्मा से भिन्न भासित हो, उसे मिथ्या जानो । मृगतृष्णा के जल की तरह उसे जानकर उसकी भावना त्यागो और स्वरूप की भावना करो ।
इति श्रीयो० निर्वाण० ब्रह्मै० कल्पप्रति० नामदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरे वचनों को ग्रहण कर हृदय में आस्तिक भावना करो । जब सर्वत्याग करोगे, तब चित्त क्षीण हो
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३३७
जावेगा और जब चित्त क्षीण हुआ तब शान्ति होगी। हे राम ! काष्ठ- वत् मौन होकर हृदय में सबका त्याग करो। बाहर से कर्मों को करो, पर अभिमान से रहित होकर अन्तर्मुख हो रहो। अन्तर्मुख आत्मा में स्थित होने को कहते हैं। जब आत्मा में स्थित होगे, तब विद्यमान दृश्य भी तुम्हें न भासित होगा, क्योंकि तब सब आत्मा ही प्रतीति होगा। जो तुम्हारे पास भेरी के शब्द होंगे, तो भी न सुन पड़ेंगे और जो सुगन्धि सूँघोगे तो भी नहीं मोहित करेगी। निदान जो कुछ कर्म करोगे सो तुम्हें स्पर्श न करेगा—आकाश की नाईं सबसे असंग रहोगे। हे राम ! स्वरूप से भिन्न न देख पड़े और आत्मा से भिन्न न फुरे, तुम अन्धे-गूँगे की तरह और पत्थर की शिला के समान मौन हो रहो, तब तुम्हारी चेष्टा यन्त्र की पुतली के समान अनिच्छित होगी। जैसे यन्त्र की पुतली धागे की सत्ता से चेष्टा करती है, वैसे ही तुम्हारी नीति-शक्ति से प्राणों की चेष्टा होगी। स्वाभाविक क्रिया में अभिमान से रहित होकर स्थित होओ। जो अभिमान सहित चेष्टा करता है, वह मूर्ख और असम्यक्दर्शी है। जो सम्यक्दर्शी है, उसको अनात्म शरीरादि में अभिमान नहीं होता। हे राम ! जिसको अनात्म में अभिमान नहीं और जिसका चित्त दृश्य में लिप्त नहीं होता, वह चाहे सारी सृष्टि का संहार करे अथवा उसे उत्पन्न करे, उसको कुछ बन्धन नहीं होता; क्योंकि वह सब कर्म अभिलाषा से रहित होकर करता है।
हे राम ! समाधि में स्थित हो और जाग्रत् की तरह सब कर्म करो। तुममें सब कर्म भी दिखें तो भी उनमें सुषुप्त की तरह कोई वासना न उठे। अपने स्वरूप की समाधि रहे। समाधि भी तब कहिये, जब कोई दूसरा हो, जो इसमें स्थित हो व इसका त्याग करे। हे राम ! जहाँ एक शब्द और दो शब्द भी नहीं कह सकते, वह अद्वितीयआत्मा परमार्थ- सत्ता है। उसमें चित्त ने नाना प्रकार के विकार कल्पित किये हैं—ज्ञानी को सब एकरस भासित होता है। ज्ञानी को ज्ञानी जानता है। जैसे सर्प के निशान को सर्प ही जानता है, वैसे ही ज्ञानी को एकरस
३३८ * योगवाशिष्ठ *
आत्मा ही भासित होता है, सो ज्ञानी ही जानता है। मूर्ख को संकल्प में नाना प्रकार का जगत दिखता है, इससे संकल्प को त्यागकर अपने प्रकृत आचार में विचरो। जैसे उन्मत्त और बालक की चेष्टा स्वाभाविक होती है कि अङ्ग हिलते हैं, वैसे ही अभिमान में रहित होकर चेष्टा करो। जैसे पत्थर की शिला जड़ होती है, वैसे ही दृश्य की भावना में ऐसे रहित हो कि जड़ की तरह कुछ न फुरे। जब ऐसे होगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। हे राम! चित्त के सम्बन्ध में क्षोभ उत्पन्न होता है। जैसे वसन्तऋतु में फूल उत्पन्न होते हैं, वैसे ही चित्तरूपी वसन्त-ऋतु में दुःखरूपी फूल उत्पन्न होते हैं। जब तुम चित्त को शान्त करोगे, तब परमपद को प्राप्त होगे, जो सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल है। इससे तुम असंग हो रहो। जब तुम स्थूल से स्थूल होगे, तब भी असंग रहोगे। ऐसे पद को पाकर काष्ठ-पत्थर की तरह मौन हो रहो।
हे राम! दृश्य पदार्थ को त्यागकर जो द्रष्टा जाननेवाला है, उसमें स्थित हो। हे राम! इन्द्रियाँ तो अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं। उनकी ओर तुम भावना मत करो कि यह सुन्दर रूप है और इसकी प्राप्ति हो। भले के प्राप्त होने की भावना मत करो। इनके जानने-वाला जो आत्मा है, उसी में स्थित रहो। जो पुरुष द्रष्टा में स्थित होता है, वह गोपद की तरह संसारसमुद्र को नाँघ जाता है। हे राम! जो पदार्थ दिखते हैं, उनमें अपनी-अपनी सृष्टि है। वह संकल्पमात्र ही है और अपने-अपने संकल्प में स्थित है। पर सब संकल्प आत्मा के आश्रित हैं। जैसे सब पदार्थ आकाश में स्थित हैं, वैसे ही सब संकल्पों की सृष्टि आत्मा के आश्रित है। एक के संकल्प को दूसरा नहीं जानता—सृष्टि अपनी-अपनी है। जैसे समुद्र में जितने बुलबुले हैं; उनकी जल में एकता है और आकार में एकता नहीं, वैसे ही स्वरूप से सबंकी एकता है और संकल्पसृष्टि अपनी-अपनी है। जो पुरुष ऐसे सोचता है कि मैं उसकी सृष्टि को जानूँ, तब जानता है।
हे राम! आत्मा कल्पवृक्ष है; उसमें जैसी कोई भावना करता है, वैसी ही सिद्धि होती है। जब ऐसी ही भावना करके जीव स्वरूप में
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३३६
लगता है कि सब सृष्टि मुझे भासित हो तो भावना से वह भासित होती है। ज्ञानी ऐसी भावना नहीं करता, क्योंकि आत्मा से भिन्न वह कोई पदार्थ नहीं जानता और जानता है कि स्वरूप से सबकी एकता है, पर संकल्परूप से एकता नहीं होती। जैसे तरंगों की एकता नहीं, पर जल की एकता है और जो एक तरंग दूसरे के साथ मिल जाती है तो उसमे एकता होती है, वैसे ही एक का संकल्प भावना से दूसरे के साथ मिलता है; इससे ज्ञानी जानता है कि संकल्परूप आकार नहीं मिलते और स्वरूप में सबकी एकता है। जिसकी भावना होती है कि मैं इसकी सृष्टि को देखूँ तो वह उसके संकल्प में अपना संकल्प मिलाकर देखता है, तब उसकी सृष्टि जानता है। जैसे दो मणियों का प्रकाश भिन्न-भिन्न होता है और जब दोनों इकट्ठी एक ही स्थान में रखिये तो दोनों का प्रकाश इकट्ठा हो जाता है, वैसे ही संकल्प की एकता भावना से होती है। ज्ञानी को प्रथम संकल्प हो कि मैं उसकी सृष्टि देखूँ तो संकल्प से देखता है, पर ज्ञान के उपजने से वाञ्छा नहीं रहती।
हे राम ! इच्छा चित्त का धर्म है। जब चित्त ही नष्ट हो गया, तब इच्छा किसको रहे। जब स्वरूप का प्रमाद होता है, तब चित्तरूपी दैत्य प्रसन्न होता है कि यह मेरा आहार हुआ और मैं इसको भोजन करूँगा। हे राम ! जो पुरुष चित्त के वश हुआ है और जिसको स्वरूप की भावना नहीं हुई, उसे चित्तरूपी दैत्य जन्मरूपी बन में लिये फिरता है; उसको लील लेता है, उसका पुरुषार्थ नष्ट करता है और आत्मभावनावाली बुद्धि उत्पन्न नहीं होने देता। जैसे वृक्ष को अग्नि लगे तो फिर उसमें फल नहीं लगते, वैसे ही पुरुषार्थरूपी वृक्ष को भोगरूपी अग्नि लगी तो शुद्ध बुद्धिरूपी फल उत्पन्न नहीं होता। हे राम ! अपना चित्त आत्मा में लगाओ और फिर विषय की ओर उसे न जाने दो। यह चित्त दुष्ट है; जब इसको स्थिर करोगे, तब परम अमृत में शोभायमान होंगे। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत में शोभा पाता है, वैसे ही ब्रह्मलक्ष्मी में शोभित होकर परम निर्वाणपद को प्राप्त होगे।
इति श्रीयो० नि० निर्वाणवर्णनं नामैकादशाधिकशततमस्सर्गः ॥ १११ ॥
३४० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञान की सप्त भूमिका हैं । इनमें ज्ञान की उत्पत्ति होती है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिस भूमिका में जिज्ञासु पहुँचता है, उसका लक्षण क्या है और ये सप्तभूमिका क्या हैं, कैसे प्राप्त होती हैं, सो कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सप्तभूमिका जिस प्रकार प्राप्त होती हैं और जिस प्रकार इनमें ज्ञान प्राप्त होता है सो सुनो । हे राम ! जब बालक माता के गर्भ में होता है, तब उसकी दृढ सुषुप्ति जड़ अवस्था होती है—जैसे ज्ञानी को होती है—परन्तु बालक में संस्कार रहता है, इससे संस्कार की सत्यता आगे होती है । जैसे बीज में अंकुर होता है, उससे आगे चलकर वृक्ष होता है; वैसे ही बालक की भावी होती है । पर ज्ञानी का भावी नहीं होती । जैसे दग्ध बीज में अंकुर नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी की भावी नहीं होती; क्योंकि वह संसार में सुप्त है, और स्वरूप में स्थित नहीं है । जब बालक को बाहर निकलकर कुछ काल व्यतीत होता है तब उसकी वह दृढ जड़ता निवृत्त हो जाती है और सुषुप्ति रहती है । कुछ काल के उपरान्त सुषुप्ति भी लय हो जाती है और चेतनता होती है । तब वह जानता है कि 'यह मैं हूँ' 'ये मेरे माता पिता हैं' । तब कुलवाले उसको सिखाते हैं कि यह मीठा है; यह कडुवा है; यह तेरी माता है; यह तेरा पिता है; यह तेरा कुल है; इससे पाप होता है; इससे पुण्य होता है; इससे स्वर्ग मिलता है, इससे नरक पाता है; इस प्रकार यज्ञ होता है, इस प्रकार तप होता है और इस प्रकार दान करते हैं ।
हे राम ! इस प्रकार कुल के उपदेश और शास्त्र के भय से वह धर्म में निरत होता और पाप का त्याग करता है । ऐसा शास्त्र के अनुसार आचरण करनेवाला पुरुष धर्मात्मा कहलाता है । वे धर्मात्मा पुरुष भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्ति की ओर है और दूसरा निवृत्ति की ओर । जो प्रवृत्ति की ओर है, वह पुण्य कर्मों से स्वर्ग के फल भोगता है और मोक्ष को उत्तम नहीं जानता, इससे संसार में जल के तृण की तरह भ्रमण करता है । कभी चिरकाल में वह इस संसार-चक्र से छुटकारा पाता है । जो निवृत्त की ओर होता है, उसको विषयभोग से वैराग्य
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३४१
उपजता और वह कहता है कि यह संसार मिथ्या है; मैं इससे तरूँ और उस पद को प्राप्त होऊँ, जहाँ क्षय और अतिशय न हो—यह संसार सर्वदा चलरूप और दुःखदायी है। हे राम! उस पुरुष को इस क्रम से ज्ञान और विज्ञान उत्पन्न होता है। और जो पशुधर्मी मनुष्य है, उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है। शास्त्र के अर्थ के न जाननेवालों को पशु-धर्मी कहते हैं। वे अपनी इच्छा के अनुसार आचरण कर अशुभ को ग्रहण करते और विचार से रहित होते हैं। मनुष्य भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्तिमार्गी और दूसरे निवृत्तिमार्गी।
जिसको शास्त्र शुभ कहे उसको ग्रहण करना और जिसे अशुभ कहे उसका त्याग करना और यह कामना करके फल के निमित्त यज्ञादिक शुभ कर्म करना कि स्वर्ग, धन, पुत्रादिक मुझे प्राप्त हों, प्रवृत्ति-मार्ग है। ऐसी कामना रखकर शुभ कर्म करके जो इस प्रकार संसारसमुद्र में बहते हैं, वे चिरकाल में निवृत्ति की ओर भी आते हैं और तब स्वरूप को जान पाते हैं। निवृत्तिमार्गी वह है, जो निष्काम होकर और शुभ कर्म करके अन्तःकरण को शुद्ध करता है, उसको वैराग्य उपजता है और वह कहता है कि मुझे कर्मों से क्या है और उनके फलों से क्या है; मैं किसी प्रकार आत्मपद को प्राप्त होऊँ। वह यही विचारता है कि मैं संसार से कब मुक्त हूँगा। यह संसार मिथ्या है और मुझे भोग से क्या है? यह भोग तो सर्प है।
हे राम! इस प्रकार वह भोगों की निन्दा करता है; संसार से उप-रत होता है; शम, दम आदिक जो ज्ञान के साधन हैं, उनका आचरण करता है; शुभ-अशुभ, देश, काल और पदार्थ को विचारता है; मर्यादा से बोलता है; संतजनों का संग करता और सत्शास्त्र और ब्रह्म-विद्या को बारम्बार विचारता है। इस प्रकार मन्तजनों के संग से उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है। जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती है और विषयों के उपरत होती है। तब वह तीर्थ, ठाकुरद्वारों आदि शुभ स्थानों को पूजता है; देह और इन्द्रियों से मन्तों की टहल करता है और सबसे मित्रता रखकर दया,