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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1146, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1146

३३८ * योगवाशिष्ठ *

आत्मा ही भासित होता है, सो ज्ञानी ही जानता है। मूर्ख को संकल्प में नाना प्रकार का जगत दिखता है, इससे संकल्प को त्यागकर अपने प्रकृत आचार में विचरो। जैसे उन्मत्त और बालक की चेष्टा स्वाभाविक होती है कि अङ्ग हिलते हैं, वैसे ही अभिमान में रहित होकर चेष्टा करो। जैसे पत्थर की शिला जड़ होती है, वैसे ही दृश्य की भावना में ऐसे रहित हो कि जड़ की तरह कुछ न फुरे। जब ऐसे होगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे। हे राम! चित्त के सम्बन्ध में क्षोभ उत्पन्न होता है। जैसे वसन्तऋतु में फूल उत्पन्न होते हैं, वैसे ही चित्तरूपी वसन्त-ऋतु में दुःखरूपी फूल उत्पन्न होते हैं। जब तुम चित्त को शान्त करोगे, तब परमपद को प्राप्त होगे, जो सूक्ष्म से सूक्ष्म और स्थूल से स्थूल है। इससे तुम असंग हो रहो। जब तुम स्थूल से स्थूल होगे, तब भी असंग रहोगे। ऐसे पद को पाकर काष्ठ-पत्थर की तरह मौन हो रहो।

हे राम! दृश्य पदार्थ को त्यागकर जो द्रष्टा जाननेवाला है, उसमें स्थित हो। हे राम! इन्द्रियाँ तो अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं। उनकी ओर तुम भावना मत करो कि यह सुन्दर रूप है और इसकी प्राप्ति हो। भले के प्राप्त होने की भावना मत करो। इनके जानने-वाला जो आत्मा है, उसी में स्थित रहो। जो पुरुष द्रष्टा में स्थित होता है, वह गोपद की तरह संसारसमुद्र को नाँघ जाता है। हे राम! जो पदार्थ दिखते हैं, उनमें अपनी-अपनी सृष्टि है। वह संकल्पमात्र ही है और अपने-अपने संकल्प में स्थित है। पर सब संकल्प आत्मा के आश्रित हैं। जैसे सब पदार्थ आकाश में स्थित हैं, वैसे ही सब संकल्पों की सृष्टि आत्मा के आश्रित है। एक के संकल्प को दूसरा नहीं जानता—सृष्टि अपनी-अपनी है। जैसे समुद्र में जितने बुलबुले हैं; उनकी जल में एकता है और आकार में एकता नहीं, वैसे ही स्वरूप से सबंकी एकता है और संकल्पसृष्टि अपनी-अपनी है। जो पुरुष ऐसे सोचता है कि मैं उसकी सृष्टि को जानूँ, तब जानता है।

हे राम! आत्मा कल्पवृक्ष है; उसमें जैसी कोई भावना करता है, वैसी ही सिद्धि होती है। जब ऐसी ही भावना करके जीव स्वरूप में