योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1145, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३३७
जावेगा और जब चित्त क्षीण हुआ तब शान्ति होगी। हे राम ! काष्ठ- वत् मौन होकर हृदय में सबका त्याग करो। बाहर से कर्मों को करो, पर अभिमान से रहित होकर अन्तर्मुख हो रहो। अन्तर्मुख आत्मा में स्थित होने को कहते हैं। जब आत्मा में स्थित होगे, तब विद्यमान दृश्य भी तुम्हें न भासित होगा, क्योंकि तब सब आत्मा ही प्रतीति होगा। जो तुम्हारे पास भेरी के शब्द होंगे, तो भी न सुन पड़ेंगे और जो सुगन्धि सूँघोगे तो भी नहीं मोहित करेगी। निदान जो कुछ कर्म करोगे सो तुम्हें स्पर्श न करेगा—आकाश की नाईं सबसे असंग रहोगे। हे राम ! स्वरूप से भिन्न न देख पड़े और आत्मा से भिन्न न फुरे, तुम अन्धे-गूँगे की तरह और पत्थर की शिला के समान मौन हो रहो, तब तुम्हारी चेष्टा यन्त्र की पुतली के समान अनिच्छित होगी। जैसे यन्त्र की पुतली धागे की सत्ता से चेष्टा करती है, वैसे ही तुम्हारी नीति-शक्ति से प्राणों की चेष्टा होगी। स्वाभाविक क्रिया में अभिमान से रहित होकर स्थित होओ। जो अभिमान सहित चेष्टा करता है, वह मूर्ख और असम्यक्दर्शी है। जो सम्यक्दर्शी है, उसको अनात्म शरीरादि में अभिमान नहीं होता। हे राम ! जिसको अनात्म में अभिमान नहीं और जिसका चित्त दृश्य में लिप्त नहीं होता, वह चाहे सारी सृष्टि का संहार करे अथवा उसे उत्पन्न करे, उसको कुछ बन्धन नहीं होता; क्योंकि वह सब कर्म अभिलाषा से रहित होकर करता है।
हे राम ! समाधि में स्थित हो और जाग्रत् की तरह सब कर्म करो। तुममें सब कर्म भी दिखें तो भी उनमें सुषुप्त की तरह कोई वासना न उठे। अपने स्वरूप की समाधि रहे। समाधि भी तब कहिये, जब कोई दूसरा हो, जो इसमें स्थित हो व इसका त्याग करे। हे राम ! जहाँ एक शब्द और दो शब्द भी नहीं कह सकते, वह अद्वितीयआत्मा परमार्थ- सत्ता है। उसमें चित्त ने नाना प्रकार के विकार कल्पित किये हैं—ज्ञानी को सब एकरस भासित होता है। ज्ञानी को ज्ञानी जानता है। जैसे सर्प के निशान को सर्प ही जानता है, वैसे ही ज्ञानी को एकरस