योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३३६
लगता है कि सब सृष्टि मुझे भासित हो तो भावना से वह भासित होती है। ज्ञानी ऐसी भावना नहीं करता, क्योंकि आत्मा से भिन्न वह कोई पदार्थ नहीं जानता और जानता है कि स्वरूप से सबकी एकता है, पर संकल्परूप से एकता नहीं होती। जैसे तरंगों की एकता नहीं, पर जल की एकता है और जो एक तरंग दूसरे के साथ मिल जाती है तो उसमे एकता होती है, वैसे ही एक का संकल्प भावना से दूसरे के साथ मिलता है; इससे ज्ञानी जानता है कि संकल्परूप आकार नहीं मिलते और स्वरूप में सबकी एकता है। जिसकी भावना होती है कि मैं इसकी सृष्टि को देखूँ तो वह उसके संकल्प में अपना संकल्प मिलाकर देखता है, तब उसकी सृष्टि जानता है। जैसे दो मणियों का प्रकाश भिन्न-भिन्न होता है और जब दोनों इकट्ठी एक ही स्थान में रखिये तो दोनों का प्रकाश इकट्ठा हो जाता है, वैसे ही संकल्प की एकता भावना से होती है। ज्ञानी को प्रथम संकल्प हो कि मैं उसकी सृष्टि देखूँ तो संकल्प से देखता है, पर ज्ञान के उपजने से वाञ्छा नहीं रहती।
हे राम ! इच्छा चित्त का धर्म है। जब चित्त ही नष्ट हो गया, तब इच्छा किसको रहे। जब स्वरूप का प्रमाद होता है, तब चित्तरूपी दैत्य प्रसन्न होता है कि यह मेरा आहार हुआ और मैं इसको भोजन करूँगा। हे राम ! जो पुरुष चित्त के वश हुआ है और जिसको स्वरूप की भावना नहीं हुई, उसे चित्तरूपी दैत्य जन्मरूपी बन में लिये फिरता है; उसको लील लेता है, उसका पुरुषार्थ नष्ट करता है और आत्मभावनावाली बुद्धि उत्पन्न नहीं होने देता। जैसे वृक्ष को अग्नि लगे तो फिर उसमें फल नहीं लगते, वैसे ही पुरुषार्थरूपी वृक्ष को भोगरूपी अग्नि लगी तो शुद्ध बुद्धिरूपी फल उत्पन्न नहीं होता। हे राम ! अपना चित्त आत्मा में लगाओ और फिर विषय की ओर उसे न जाने दो। यह चित्त दुष्ट है; जब इसको स्थिर करोगे, तब परम अमृत में शोभायमान होंगे। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत में शोभा पाता है, वैसे ही ब्रह्मलक्ष्मी में शोभित होकर परम निर्वाणपद को प्राप्त होगे।
इति श्रीयो० नि० निर्वाणवर्णनं नामैकादशाधिकशततमस्सर्गः ॥ १११ ॥