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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1148, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1148

३४० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञान की सप्त भूमिका हैं । इनमें ज्ञान की उत्पत्ति होती है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिस भूमिका में जिज्ञासु पहुँचता है, उसका लक्षण क्या है और ये सप्तभूमिका क्या हैं, कैसे प्राप्त होती हैं, सो कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सप्तभूमिका जिस प्रकार प्राप्त होती हैं और जिस प्रकार इनमें ज्ञान प्राप्त होता है सो सुनो । हे राम ! जब बालक माता के गर्भ में होता है, तब उसकी दृढ सुषुप्ति जड़ अवस्था होती है—जैसे ज्ञानी को होती है—परन्तु बालक में संस्कार रहता है, इससे संस्कार की सत्यता आगे होती है । जैसे बीज में अंकुर होता है, उससे आगे चलकर वृक्ष होता है; वैसे ही बालक की भावी होती है । पर ज्ञानी का भावी नहीं होती । जैसे दग्ध बीज में अंकुर नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी की भावी नहीं होती; क्योंकि वह संसार में सुप्त है, और स्वरूप में स्थित नहीं है । जब बालक को बाहर निकलकर कुछ काल व्यतीत होता है तब उसकी वह दृढ जड़ता निवृत्त हो जाती है और सुषुप्ति रहती है । कुछ काल के उपरान्त सुषुप्ति भी लय हो जाती है और चेतनता होती है । तब वह जानता है कि 'यह मैं हूँ' 'ये मेरे माता पिता हैं' । तब कुलवाले उसको सिखाते हैं कि यह मीठा है; यह कडुवा है; यह तेरी माता है; यह तेरा पिता है; यह तेरा कुल है; इससे पाप होता है; इससे पुण्य होता है; इससे स्वर्ग मिलता है, इससे नरक पाता है; इस प्रकार यज्ञ होता है, इस प्रकार तप होता है और इस प्रकार दान करते हैं ।

हे राम ! इस प्रकार कुल के उपदेश और शास्त्र के भय से वह धर्म में निरत होता और पाप का त्याग करता है । ऐसा शास्त्र के अनुसार आचरण करनेवाला पुरुष धर्मात्मा कहलाता है । वे धर्मात्मा पुरुष भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्ति की ओर है और दूसरा निवृत्ति की ओर । जो प्रवृत्ति की ओर है, वह पुण्य कर्मों से स्वर्ग के फल भोगता है और मोक्ष को उत्तम नहीं जानता, इससे संसार में जल के तृण की तरह भ्रमण करता है । कभी चिरकाल में वह इस संसार-चक्र से छुटकारा पाता है । जो निवृत्त की ओर होता है, उसको विषयभोग से वैराग्य