योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३४१
उपजता और वह कहता है कि यह संसार मिथ्या है; मैं इससे तरूँ और उस पद को प्राप्त होऊँ, जहाँ क्षय और अतिशय न हो—यह संसार सर्वदा चलरूप और दुःखदायी है। हे राम! उस पुरुष को इस क्रम से ज्ञान और विज्ञान उत्पन्न होता है। और जो पशुधर्मी मनुष्य है, उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है। शास्त्र के अर्थ के न जाननेवालों को पशु-धर्मी कहते हैं। वे अपनी इच्छा के अनुसार आचरण कर अशुभ को ग्रहण करते और विचार से रहित होते हैं। मनुष्य भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्तिमार्गी और दूसरे निवृत्तिमार्गी।
जिसको शास्त्र शुभ कहे उसको ग्रहण करना और जिसे अशुभ कहे उसका त्याग करना और यह कामना करके फल के निमित्त यज्ञादिक शुभ कर्म करना कि स्वर्ग, धन, पुत्रादिक मुझे प्राप्त हों, प्रवृत्ति-मार्ग है। ऐसी कामना रखकर शुभ कर्म करके जो इस प्रकार संसारसमुद्र में बहते हैं, वे चिरकाल में निवृत्ति की ओर भी आते हैं और तब स्वरूप को जान पाते हैं। निवृत्तिमार्गी वह है, जो निष्काम होकर और शुभ कर्म करके अन्तःकरण को शुद्ध करता है, उसको वैराग्य उपजता है और वह कहता है कि मुझे कर्मों से क्या है और उनके फलों से क्या है; मैं किसी प्रकार आत्मपद को प्राप्त होऊँ। वह यही विचारता है कि मैं संसार से कब मुक्त हूँगा। यह संसार मिथ्या है और मुझे भोग से क्या है? यह भोग तो सर्प है।
हे राम! इस प्रकार वह भोगों की निन्दा करता है; संसार से उप-रत होता है; शम, दम आदिक जो ज्ञान के साधन हैं, उनका आचरण करता है; शुभ-अशुभ, देश, काल और पदार्थ को विचारता है; मर्यादा से बोलता है; संतजनों का संग करता और सत्शास्त्र और ब्रह्म-विद्या को बारम्बार विचारता है। इस प्रकार मन्तजनों के संग से उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है। जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती है और विषयों के उपरत होती है। तब वह तीर्थ, ठाकुरद्वारों आदि शुभ स्थानों को पूजता है; देह और इन्द्रियों से मन्तों की टहल करता है और सबसे मित्रता रखकर दया,