योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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सत्य और कोमलता धारणकर विचरता है। वह ऐसे वचन बोलता है, जिनसे सब कोई प्रसन्न हों और जो यथाशास्त्र हों। इससे भिन्न किसी को कुद्ध नहीं कहता। वह अज्ञानी का संग त्यागता है; स्वर्ग आदि के सुखों की कामना नहीं करता—केवल आत्मपरायण होता है; सन्तों और शास्त्रों की दृढ़भक्ति करता है और उनके अर्थों में मन लगाकर और किसी ओर चित्त नहीं लगाता। जैसे कदर्य मूर्ख सर्वदा धन का चिन्तन करता है, वैसे ही वह सदा आत्मा का चिन्तन करता है। जो पुरुष इतने गुणों से युक्त है, उसको प्रथम भूमिका प्राप्त हुई है। वह पापरूपी सर्प को बाँस के समान नष्ट करता है; मन्तजन, मन्तशास्त्र और धर्मरूपी मेघ को गर्दन ऊँची करके देखता है और प्रसन्न होता है। इसका नाम शुभेच्छा है। उसको फिर दूसरी भूमिका प्राप्त होती है। तब जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है। उसका लक्षण है—मन्तशास्त्रों और ब्रह्मविद्या को विचार कर उनमें दृढ़ भावना करना। इस विचार का कवच जो गले में डालना है, उससे शस्त्रों का कोई घाव नहीं लगता। इन्द्रियरूपी चोर के हाथ में इच्छारूपी बरछी है। वह विचाररूपी कवच पहननेवाले को नहीं लगती।
हे राम ! इन्द्रियरूपी सर्प में तृष्णारूपी विष है, उससे वह मूर्ख को मारता है। विचारवान् पुरुष इन्द्रियों के विषयों का नाश कर डालता है, सब ओर से उदासीन रहता है और दुर्जनों की संगति को बल करके त्याग करता है। जैसे गधा तृण को त्यागता है, वैसे ही वह मूर्ख की संगति को त्यागता है। उसमें सब इच्छाओं का भी त्याग होता है; परन्तु एक यह इच्छा रहती है कि दया सब पर करता है और मन्तापवान रहता है। उसके निषिद्धदोष स्वाभाविक रूप से जाते रहते हैं—दम्भ, गर्व, मोह, लोभ आदि स्वभावतः नष्ट हो जाते हैं। जैसे सर्प कञ्चुकी (केंचुल) को त्यागकर शोभायमान होता है, वैसे ही विचार-वान् पुरुष इन्द्रियों के विषयों को त्यागकर शोभा पाता है। जो उसको क्रोध भी आता है तो क्षणमात्र रहता है, हृदय में स्थिर नहीं हो सकता। वह खाना, पीना, लेना, देना आदि कर्म विचारपूर्वक करता है और