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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1151, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1151

✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ३४३

सर्वदा शुद्धमार्ग में विचरणता है। मन्तजनों का संगकर और सतशास्त्रों का अर्थ विचारकर बोध को बढ़ाता और तीर्थों के स्नान से काल व्यतीत करता है। हे राम ! यह दूसरी भूमिका है।

जब तीसरी भूमिका आती है, तब श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्म-शास्त्र) के अर्थ हृदय में स्थित होते हैं और जैसे कमल पर भँवरे आकर स्थित होते हैं, वैसे ही उस पुरुष के हृदय में शुभ गुण स्थित होते हैं। तब उसे फूलों की शय्या सुखदायी नहीं लगती, वन और कन्दरा सुख-दायक लगती हैं। निदान उसका वैराग्य दिन दिन बढ़ता जाता है। वह तालाबों, बावलियों और नदियों में स्नान करके शुभ स्थानों में रहता है। पत्थर की शिला पर शयन करता है। देह को तप से क्षीण करता है। धारणा से चित्त को किमी स्थान में नहीं लगाता। आत्म-भावना और ध्यान करके भोगों से सर्वदा निवृत्त होता है। भोगों को अन्तवन्त विचार कर अर्थात् ये बने नहीं रहते, यह सोचकर और देह के अहंकार को उपाधि जानकर वह त्यागता है। देह को रक्त, मांस, मल आदिक से पूर्ण जानकर उसमें अहंकार को त्यागता है। उसकी निन्दा करता है और सूखे तृण की नाईं तुच्छ जानकर त्याग देता है। जैसे विष्ठायुक्त तृण को पशु त्यागता है, वैसे ही देह के अहंकार को वह त्यागता है और कन्दराओं में विचर कर फल-फूलों का आहार करता है, मन्तजनों की टहल करके आयु बिताता है और सदा असंग रहता है। यह तीसरी भूमिका है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रथमद्वितीयतृतीय भूमिकालक्षण-विचारो नाम द्वादशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११२ ॥

वसिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञान का यह साधन है कि ब्रह्मविद्या को विचार के उसके अर्थ की बारम्वार भावना करे और पुण्यक्रियाओं का आचरण करे। इससे भिन्न ज्ञान का कोई साधन नहीं—इसी से ज्ञान की प्राप्ति होती है। जिस पुरुष को ऐसी भावना होती है, उसको यदि नाना प्रकार की सुगन्ध—अगर, चन्दन, चोये आदि और अप्सरा अनिच्छित प्राप्त हों तो उनका निगदर करता है और जो स्त्री को देखता