योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1152, कुल 1734 में से
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है तो माता समान जानता है; पराये धन को पत्थर के बट्टे समान देखकर वाञ्छा नहीं करता और सब प्राणियों पर दया करता है। जैसे अपने सुख को प्रसन्न करनेवाला है और दुःख को अनिष्ट जानता है, वैसे ही और को भी अपने सदृश जानकर सुख देता है, दुःख किसी को नहीं देता। इस प्रकार वह पुण्य कर्म करता रहता है। सतशास्त्रों के अर्थ का अभ्यास करता है और सर्वदा असंग रहता है। असंग भी दो प्रकार का है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! संग-असंग का लक्षण क्या है, इनका भेद समझाकर कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! असंग दो प्रकार का है—एक समान और दूसरा विशेष। उनका लक्षण सुनो। समान असंग यह है कि मैं कुछ नहीं करता, न मैं किसी को देता हूँ और न मुझे कोई देता है। सब ईश्वर की आज्ञा है। जिसको धन देने की इच्छा होती है उसको वह धन देता है और जिससे लेना होता है उससे लेता है; अपने अधीन कुछ नहीं। समान असंगवाला जो कुछ दान, तप, यज्ञादि करता है, वह ईश्वरार्पण करता है और अपना अभिमान कुछ नहीं करता। कहता है कि सब ईश्वर की शक्ति से होता है। इस प्रकार निरभिमान होकर वह धर्मचेष्टा में स्वाभाविक विचरणता है। जो कुछ इन्द्रियों के भोग की सम्पदा है उसको आपदा जानता है, और भोगों को महाआपदारूप मानता है। सम्पदा आपदारूप है; संयोग वियोग-रूप है और जितने पदार्थ हैं वे सब सन्निपातरूप हैं—विचार से नष्ट हो जाते हैं। इससे सबको वह नाशरूप जानता है।
यह संयोग-वियोग को दुःखदायी जानता है। परस्त्री को विष का बेलि समान रस से रहित जानता है और सब पदार्थों को परिणामी जान कर किसी की इच्छा नहीं करता। सम्पूर्ण विश्व का जो ईश्वर है, उसे जिसको सुख देना है, उसको वह सुख देता है और जिसको दुःख देना है उसको दुःख देता है। अपने हाथ कुछ नहीं। करने करानेवाला ईश्वर है। न मैं करता हूँ; न मैं भोक्ता हूँ; और न मैं वक्ता हूँ—सब ईश्वर की सत्ता से होता है। ऐसे निरभिमान होकर वह पुण्यकर्म करता है। यह समान असंग है। उसके वचन सुनने में श्रवण को अमृत की प्राप्ति होती