योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1153, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ेंनिर्वाण प्रकरण । ३४५
है । इस प्रकार सन्तों के मिलने और तीसरी भूमिका की प्राप्ति से जिसकी बुद्धि बढ़ी है और जो निरभिमान है, उसके उपदेश में अनुभव से तब तक अभ्यास करे, जब तक हाथ पर रखे आँवले की नाईं आत्मा का अनुभव साक्षात्कार प्रत्यक्ष हो । विशेष असंगवाला कहता है कि न मैं कुछ करता हूँ, न कराता हूँ; केवल आकाशरूप आत्मा हूँ । न मुझमें करना है, न कराना है। न कोई और है, न मेरा है। मैं केवल आकाशरूप अद्वैत आत्मा हूँ।
हे राम ! वह पुरुष न भीतर, न बाहर, न पदार्थ, न अपदार्थ, न जड़, न चेतन, न आकाश, न पाताल, न देश, न पृथ्वी, न मैं न मेरे को देखता है । वह निर्वाण, अज, अविनाशी, सब शब्द-अर्थों से रहित, केवल शून्य आकाश में स्थित है । चित्त से रहित चेतन में जो प्रस्थित है, उसको श्रेष्ठ असंग कहते हैं । उसकी चेष्टा देख भी पड़ती है तो भी उसमें हृदय में पदार्थों की भावना का अभाव है । जैसे जल में कमल दिखता है । परन्तु जल से ऊपर ही रहता है, वैसे ही वह कर्म करता देख पड़ने पर भी असंग रहता है । उसको कोई कामना नहीं रहती कि यह हो और यह न हो; क्योंकि उसको संसार का अभाव निश्चय हुआ है और वह सब कल्पनाओं से रहित है । उसको आत्मा से भिन्न किसी पदार्थ की सत्ता नहीं फुरती । यह श्रेष्ठ असंग कहाता है । कार्य करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और न करने में कुछ हानि नहीं होती । वह सर्वदा असंग है और संसार में कभी नहीं डूबता, क्योंकि वह तो संसारसमुद्र के पार हुआ है, उसने अनात्म में आत्म-भावना त्यागी है; अहंभाव का त्याग किया है । इष्ट-अनिष्टरूप जितने पदार्थ हैं, उनके सुख-दुःख की वेदना उसे नहीं फुरती और वह सदा मौनरूप हैं। उसके लेखे धन पत्थर के समान है । यह श्रेष्ठ असंग कहाता है ।
हे राम ! एक कमल है, जो अज्ञानरूपी कीचड़ से निकलकर आत्मरूपी जल में विराजता है । उसका बीज संसार की अभावना है । उस जल में तृष्णारूपी मछलियाँ हैं, जो उस कमल के चहुँ ओर