योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३४६ योगवाशिष्ठ ।
फिरती है और उसके साथ कुकर्म दुःखरूपी काँटे हैं। अज्ञानरूपी रात्रि में उस कमल का मुख मूँदा रहता है और विचाररूपी सूर्य का उदय होने से वह खिलता और शोभा पाता है। उसमें सुगन्ध सन्तोष है। वह हृदय के बीच लगता है। उसका फल असंग है। यह तीसरी भूमिका में उगता है। हे राम! सन्तों की संगति और सतशास्त्रों के विचार से मनुष्य सार को प्राप्त करता है और अमृत मोक्ष को पाता है। बड़ा कष्ट है कि ऐसे स्वरूप को भूलकर जीव दुःखी होते हैं। इनका स्वरूप आनन्दरूप है, जो दुःखों का नाश करता है और जिसमें कोई दुःख नहीं। वह इन भूमिकाओं के द्वारा प्राप्त होता है। हे राम! यह तीसरी भूमिका ज्ञान के निकटवर्ती है और विचारवान् पुरुष इन भूमिकाओं में स्थित होकर बुद्धि को बढ़ाते हैं। जब इस प्रकार मनुष्य बोध को बढ़ाता है तो शास्त्र की युक्ति से रक्षा करता है और क्रमशः इस तीसरी भूमिका को प्राप्त होता है, जहाँ असंगता प्राप्त होती है। जैसे किसान खेती की रक्षा करके उसे बढ़ाता है, वैसे ही वह विचाररूपी जल से बुद्धि को बढ़ाना है। तब बुद्धिरूपी बेल बढ़ती है। फिर चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है और अहंकार, मोहादिक शत्रुओं से रक्षा होती है।
हे राम! इस भूमिका को प्राप्त होकर मनुष्य ज्ञानवान् होता है। सो यह भूमिका क्रमशः प्राप्त होती है, अथवा बड़े पुण्य कर्म किये हों तो फुरती है या अकस्मात् भी फुरती है। जैसे नदी के तट पर कोई आ बैठा हो और नदी के वेग से बीच में जा पड़े, वैसे ही जब पहली भूमिका प्राप्त होती है, तब बुद्धि को बढ़ाती है, और जब बुद्धिरूपी बेलि बढ़ती है, तब ज्ञानरूपी फल लगता है। जब ज्ञान उपजता है, तब उसमें प्रत्यक्ष क्रिया दिखे तो भी उसका वह अभिमान नहीं करता, जैसे शुद्धमणि प्रतिबिम्ब को ग्रहण भी करती है, परन्तु उसमें कोई रङ्ग नहीं चढ़ता।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे तृतीयाभूमिकाविचारो नाम त्रयोदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११३ ॥
राम बोले, हे भगवन्! आपने भूमिका का वर्णन किया, पर उसमें