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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1155, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1155

* निर्वाण प्रकरण * ३४७

मुझे यह संशय है कि जो भूमिका से रहित और प्रकृति के सम्मुख हैं उनको भी कदाचित् ज्ञान उपजेगा अथवा न उपजेगा ? जो एक, दो वा तीन भूमिका पाकर शरीर छूटे और आत्मा का साक्षात्कार न हुआ हो और उसको स्वर्ग की भी कामना न हो, तो वह कौन गति पाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष विषयी हैं, उनको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है । वे वासना करके घटीयन्त्र की तरह कभी स्वर्ग की ओर कभी पाताल को जाते और दुःख पाते हैं । कभी अकस्मात् काकतालीय न्याय से ही उनको सन्तों के संग और सत्शास्त्रों को सुनने की वासना फुरती है । जैसे मरुस्थल में बेलि लगना कठिन है, वैसे ही जिस पुरुष को आत्मा का प्रमाद और भोग की भावना है उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है । परन्तु जब अकस्मात् उसे सन्तों के संग से वैराग्य उपजता है और उसकी बुद्धि निवृत्ति की ओर आती है, तब भूमिका के द्वारा उसे ज्ञान प्राप्त होता है और तभी वह मुक्त होता है ।

हे राम ! अकस्मात् की यही भावना उपजे बिना जीव नाना योनियों में भ्रमता है । जिसको एक अथवा दो भूमिका प्राप्त हुई हैं और शरीर छूट गया तो वह और जन्म पाकर ज्ञान को प्राप्त होता है, उसका पिछला संस्कार जाग जाता है और दिन-दिन बढ़ता जाता है । जैसे बीज से प्रथम वृक्ष का अंकुर होता है, फिर डाल, फूल और फल से वह बढ़ता जाता है, वैसे ही उसका अभ्यास बढ़ता जाता है और ज्ञान प्राप्त होता है । जैसे पहलवान कसरत कर रात्रि को सो जाता है और फिर दिन हुए उठता है तब पहलवानी का अभ्यास आप फुरता है और वह कसरत करने लगता है, अथवा जैसे कोई मार्ग चलता-चलता सो जावे और जागकर चलने लगे, वैसे ही वह फिर पूर्व के अभ्यास में लगता है । हे राम ! जिसको यह भावना होती है कि मुझे विशेषता प्राप्त हो, वह जन्म पाता है । ब्रह्मा से चींटीपर्यन्त जिसको विशेष होने की कामना है, वह भी जन्म पाता है । ज्ञानी को भोगों की और विशेष प्राप्त होने की इच्छा नहीं होती । जिसको भोग की इच्छा होती है, वह भोग में अपने को विशेष जानता है और अनिष्ट की निवृत्ति की