सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1156, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1156

३४८ * योगवाशिष्ठ *

इच्छा करता है । ज्ञानी को कोई वासना नहीं होती कि यह विशेषता मुझे प्राप्त हो, इसी से वह फिर जन्म नहीं पाता । जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही वासना से रहित ज्ञानी जन्म नहीं पाता ।

हे राम ! जन्म का कारण वासना है । जैसी-जैसी वासना होती है, वैसी-वैसी अवस्था को जीव प्राप्त होता है । वासना नाना प्रकार की हैं । जब शरीर छूटने का समय आता है, तब जो वासना प्रबल दृढ़ होती है और जिसका सर्वदा अभ्यास होता है, वही अन्तकाल में दिखाई देती है, चाहे वह पाठ की, तप की, कर्म की, देवता इत्यादिक की हो, सबको दबाकर वही उस समय उठती है । हे राम ! उस समय जो सामने पदार्थ होते हैं, वे भी नहीं भासित होते; पाँचों इन्द्रियों के विषय विद्यमान हों तो भी नहीं भासित होते; वही पदार्थ भासित होता है, जिसका दृढ़ अभ्यास किया हुआ होता है । वासनाएँ तो अनेक होती हैं, परन्तु जैसी वासना दृढ़ होती है, उसी के अनुसार शरीर धारण करता है । जब देह छूटती है, तब मुहूर्तपर्यन्त सुषुप्ति की नाईं जड़ता रहती है, उसके उपरान्त चेतनता होती है । तब जीव वासना के अनुसार शरीर देखता है और जानता है कि यह मेरा शरीर है; मैं उत्पन्न हुआ हूँ । कोई ऐसे होते हैं कि उसी क्षण में युग का अनुभव करते हैं । कोई ऐसे होते हैं कि चिरकाल पर्यन्त जड़ रहते हैं, तब उनको चेतनता फुरती है, और उसके अनुसार संसार भ्रम देखते हैं । और कोई, जो संस्कारवान् होते हैं, उनको शीघ्र ही एक क्षण में चेतनता होती है और वे जानते हैं कि हम उस जगह मरे थे और इस जगह जन्मे हैं; यह हमारी माता है, यह पिता है और यह कुल है ।

इस प्रकार एक मुहूर्त में जागकर वे देखते हैं और बड़े कुल को देखते हैं । इसी प्रकार वे परलोक और यमराज के दूतों को देखते हैं और जानते हैं कि ये हमें लिये जाते हैं और हमारे पुत्रों ने पिण्ड दिये हैं, उन पिण्डों से हमारा शरीर बना है और दूत ले चले हैं । तब आगे ये धर्मराज को देखते हैं और उनके निकट जाके खड़े होते हैं । पुण्य और पाप दोनों मूर्ति धारण कर उनके आगे स्थित