योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें* निर्वाण प्रकरण * ३४६
होते हैं । तब धर्मराज अन्तर्यामी से एक-एक का हाल पूछते हैं कि इसने क्या कर्म किये हैं ? यदि पुण्यवान् होता है तो स्वर्गभोग भोगा-कर फिर योनि में डाला जाता है और जो पापी होता है तो नरक में डाल देते हैं । निदान सब प्रकार के जन्म लेने पड़ते हैं । सर्प की योनि में कहता है कि मैं सर्प हूँ । ऐसे ही जब जीव बैल, वानर, तीतर, मछली, बगला, गर्दभ, बेलि, वृक्ष इत्यादि की योनि पाता है, तो जानता है कि मैं यही हूँ । अकस्मात् काकतालीय न्याय से कभी मनुष्यशरीर पाता है तो माता के गर्भ में जानता है कि यहाँ मैंने जन्म लिया है; यह मेरी माता है, मैं पिता से उत्पन्न हुआ हूँ और यह मेरा कुल है । फिर बाहर निकलता है और बालक होता है तब जानता है कि मैं बालक हूँ । यौवन अवस्था होती है तब जानता है कि मैं जवान हूँ । फिर वृद्ध होता है तब जानता है कि मैं वृद्ध हूँ ।
इस प्रकार काल बिताकर जब मरता है तो सर्प, तोता, तीतर, वानर, मच्छ, कच्छ, वृक्ष, पशु, पक्षी, देवता इत्यादिक जन्म धारण करता है । हे राम ! संसार में वह घटीयन्त्र की तरह फिरता है । कभी ऊपर और कभी नीचे को जाता है । इसी प्रकार स्वरूप के प्रमाद से जीव दुःख पाता है । हे राम ! इतना विस्तार जो तुमसे कहा है, सो बना कुछ नहीं, केवल अद्वैत आत्मा है; पर चित्त के संयोग से इतना भ्रम देखता है । वासना द्वारा विमानों को देखता है और आकाश में जाता है । जैसे पवन गन्ध को ले जाता है, वैसे ही पुर्यष्टका को साथ ले जाता है और शरीर देखता है । हे राम ! आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । परन्तु चित्त के संयोग से जीव इतने भ्रम देखता है । इससे चित्त को स्थिर करो तो भ्रम मिट जायगा और आत्मतत्त्वमात्र ही शेष रहेगा । जो शुद्ध और आनन्दरूप है, उसी में स्थित हो रहो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्ववासनारूपवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह तो प्रवृत्तिवाले का क्रम कहा । अब निवृत्ति का क्रम सुनो । जिसको भूमिका प्राप्त हुई है और आत्मपद