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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1158, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1158

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  • योगवासिष्ठ *

नहीं प्राप्त हुआ, उसके सब पाप भस्म हो जाते हैं। जब उसका शरीर छूटता है; तब वह वासना के अनुसार शून्याकार हुआ। फिर अपने साथ शरीर देखता है और फिर बड़े परलोक को देखता है, जहाँ स्वर्ग के सुख भोगता है। फिर विमान पर चढ़कर लोकपालों के पुरों में विचरता है, जहाँ मन्द मन्द पवन चलता है, सुन्दर वृक्षों की सुगन्ध है और पाँचों इन्द्रियों के रमणीय विषय हैं। देवताओं में क्रीड़ा करता है और भोगों को भोगकर संसार में उपजता है। फिर भूमिका क्रम को प्राप्त होता है। जैसे मार्ग चलता कोई सो जाय तो वह जागकर फिर चलता है, वैसे ही शरीर पाकर वह फिर भूमिका के क्रम को प्राप्त होता है और जैसी जैसी भावना दृढ़ होती है, वैसे ही वैसे भाषित होता है। यह सब जगत् संकल्पमात्र है। संकल्प के अनुसार ही यह भाषित होता है और वासना के अनुसार परलोक के भ्रम जन्य सुख-दुःख देखता है। वहाँ से उन्हें भोगकर फिर संसार में आ पड़ता है। इसी प्रकार संकल्प से भटकता है। फिर जब कभी आत्मा की ओर उन्मुख होता है, तब संसार का भ्रम मिट जाता है। जब तक आत्मा की ओर नहीं आता, तब तक अपने संकल्प से संसार को देखता है। प्रति जीव को अपनी अपनी सृष्टि भाषित होती है। देवता, दैत्य, भूमिलोक, स्वर्ग, सब संकल्प के रचे हुए हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र से लेकर तृण तक, जो कुछ संसार दिखता है, वह सब मनोमात्र है, मन के संकल्प से उदय हुआ है और असद्रूप है। जैसे मनोराज्य, गन्धर्वनगर और स्वप्नसृष्टि भ्रम है, वैसे ही यह जगत् भ्रम है। सब सृष्टि परस्पर अदृष्ट है; कहीं उदय होती दिखती है और कहीं लय हो जाती है।

जैसे मूर्च्छ और देश को जाता है, वैसे ही देह को त्यागकर जीव परलोक को जाता है। पर स्वरूप की स्थिति में आना जाना, अहं त्व की कोई कल्पना नहीं है—केवल सत्तामात्र अपने आपमें स्थित है। और जगत् भी वही है। हे राम! यह विश्व आत्मस्वरूप है। जैसे मणि में चमक का चमत्कार होता है, वैसे ही विश्व-आत्मा का चमत्कार है। जो कुछ तुमको दिखता है, सो आत्मा ही है। आत्मा के

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