सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1159, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1159

निर्वाण प्रकरण३५१

विना आभास नहीं होता । जैसे ईख मधुरता और मिरचों में कड़वाहट होती है, वैसे ही आत्मा में विश्व है । जो कुछ भी देखो, सुनो, स्पर्श करो और सुगन्ध लो, उसे सब आत्मा ही जानो । अथवा जो इनको जाननेवाला अनुभवरूप है, उसमें स्थित हो इन्द्रियों को जीत-कर और उनके विषयों को त्यागकर अनुभवरूप में स्थित होओ । हे राम ! यह विश्व संवित्‌रूप है और संवित् ही विश्वरूप है । जब संवित् बहिर्मुख होकर रस लेती है, तब जाग्रत् को देखती है । जब अन्तर्मुख होकर रस लेती है, तब स्वप्न होता है और जब शान्त हो जाती है तब सुषुप्ति होती । संसार को सत्य जानकर जब रस लेती है, तब जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था होती है और जब संवित् में रस की सत्यता जाती रहती है, तब तुरीयपद होता है । यह पदार्थ है, या नहीं; जब यह भावना नष्ट हो, तब तुरीयपद समझो । हे राम ! यह विश्व स्फुरणमात्र है; जब स्फुरण नष्ट हो जाता है, तब विश्व देखने में नहीं आता । जैसे स्वप्न के देश, काल, पदार्थ जागने से मिथ्या होते हैं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी मिथ्या है । जीव-जीव प्रति जो अपनी-अपनी सृष्टि होती है, उसमें आप भी कुछ बन जाता है, इससे दुःखी होता है । जब इस अहंकार को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित हो, तब विश्व कहीं नहीं है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सृष्टिनिर्वाणैकताप्रति- पादनं नाम पञ्चदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस सृष्टि का स्वरूप संकल्पमात्र है, और संकल्प भी आकाशरूप है । आकाश और स्वर्ग में कुछ भेद नहीं; जैसे पवन और स्पन्दन में भेद नहीं होता । सृष्टि में अनेक पदार्थ हैं, परन्तु परस्पर नहीं बाधा डालते । वास्तव में विश्व भी आत्मा का चमत्कार और आत्मरूप है । जो आत्मरूप है तो राग और द्वेष किसमें कीजिये । चेतन धातु में कोटि ब्रह्माण्ड स्थित हैं, और यह आश्चर्य है कि आत्मा में कुछ नहीं हुआ । भिन्न-भिन्न संवेदन दृष्टि आती है, और नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं । हे राम ! जीव-जीव प्रति