योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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अपनी-अपनी सृष्टि है। एक सृष्टि ऐसी है कि उसका रूप एक-सा देख पड़ता है, परन्तु सृष्टि अपनी-अपनी है। और कई सृष्टियाँ ऐसी हैं कि भिन्न-भिन्न हैं, पर समानता से एक ही दिखती हैं। जैसे जल की बूँदें इकट्ठी होती हैं और धूल के कण भिन्न-भिन्न होते हैं, परन्तु एक ही धूल प्रतीत होती है। जैसे नदी में नदी पड़ती है तो एक ही जल हो जाता है, वैसे ही समान अधिकरण में सब संकल्प एक ही भासित होते हैं; एक एक के साथ मिलते हैं और नहीं भी मिलते। जैसे क्षीर-समुद्र में घृत डालिये तो नहीं मिलता, वैसे ही कुछ संकल्प ऐसे हैं कि और में नहीं मिलते—जैसे सूर्य, दीपक और मणि का प्रकाश भिन्न-भिन्न दिखता है पर एक-सा होता है, वैसे ही कई सृष्टियाँ एक-सी भासित होती हैं और भिन्न-भिन्न भी होती हैं। हे राम! इतनी सृष्टियाँ जो मैंने तुमसे कही हैं सो सब अधिष्ठान में फुरने से कई कोटि उत्पन्न होती हैं और कई कोटि लीन हो जाती हैं। जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उठकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही सृष्टियाँ उत्पन्न और लीन होती हैं। पर अधिष्ठान ज्यों का त्यों है; क्योंकि उसमें कुछ भिन्न नहीं। ब्रह्म, आत्मा आदिक जो सब हैं, सो भी स्फुरण में हुए हैं। जब तक शब्द-अर्थ की भावना है, तबतक वे भासित होते हैं। जब भावना निवृत्त हो जायगी, तब शब्द या अर्थ कुछ न भासित होगा; केवल शुद्ध चैतन्यमात्र ही शेष रहेगा और संसार का भाव किसी जगह न होगा। जैसे पवन जब तक चलता है; तब तक जाना जाता है कि पवन है और गन्ध भी पवन ही से जानी जाती है कि सुगन्ध आई अथवा दुर्गन्ध आई, और जब पवन नहीं चलता तब उसका वेग नहीं मालूम होना और गन्ध भी नहीं ज्ञात होती, वैसे ही जब स्फुरण निवृत्त होता है, तब संसार और संसार का अर्थ, दोनों नहीं भासित होते। फुरने में जीव जीव प्रति सृष्टि है, उस सृष्टि में सत्तासमान ब्रह्म स्थित है। वही सबका अपना रूप है—वह द्वैत भाव को कभी नहीं प्राप्त हुआ।
हे राम! इस कारण ऐसा जानो कि आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि आदि सब पदार्थ आत्मा ही हैं, अथवा ऐसे जानो कि सब मिथ्या हैं,