योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1161, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❉ निर्वाण प्रकरण ❉ ३५३
इनका साक्षी ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। उससे कुछ भिन्न नहीं और उसी ब्रह्म के अंश में अनेक सुमेरु और मन्दराचल आदिक स्थित हैं। आत्मा में अंशांशीव भी स्थूलता के निमित्त कहे हैं, वास्तव नहीं हैं-समझाने के लिए कहे हैं। आत्मा एकरस है। हे राम! ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो आत्मसत्ता बिना हो। जिसको सत्य जानते हो, वह भी आत्मा है और जिसको असत्य जानते हो वह भी आत्मा है। आत्मा में जैसे सत्य फुरता है, वैसे ही असत्य भी फुरता है-फुरना दोनों का तुल्य है। जैसे मनुष्य स्वप्न में एक को सत्य और दूसरे को असत्य जानता है, वैसे ही जो इन्द्रियों के विषय होते हैं, उनको सत्य जानता है, और आकाश के फूल और शश के सींग को असत्य कहता है। ये सब अनुभव से जागे हैं, इससे अनुभवरूप हैं। ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो आत्मा में असत् नहीं। जो कुछ पदार्थ भासित होते हैं, सो सब फुरने से हुए हैं। क्या सत्य और क्या असत्य, सब मिथ्या और स्वप्न के सत् और असत् की तरह हैं। जो अनुभव से सिद्ध है सो सब सत्य है और अनुभव से भिन्न असत्य है। हे राम! तुम गुणातीत परमात्मस्वरूप में स्थित होओ। हे राम! ज्ञानवान् पुरुष भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल में सम रहता है। दसो दिशा, आकाश, जल, अग्नि आदिक सब पदार्थ उसको आत्मा ही देख पड़ते हैं-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं जान पड़ता। ये सूर्य, चन्द्रमा और तारे, सब आत्मा हैं। यह विश्व आकाशरूप, शुद्ध और निर्मल है। आकाश में आकाश स्थित है, कुछ भिन्न नहीं। जो तुम्हें भिन्न लगे, उन्हें मिथ्या जानो। वे भ्रम से सिद्ध हुए हैं, कोई सत् नहीं। पर परमार्थ से देखो तो सब आत्मा ही है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वाकाशैकताप्रतिपादनं नाम षोडशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह विश्व स्वप्न के समान है। जैसे स्वप्न की सेना नाना प्रकार की दीखती है और शस्त्र चलते देख पड़ते हैं, पर आत्मा में इनका रूप देखना और मानना मिथ्या है। शब्द और अर्थ