योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1162, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३५४ 卐 योगवाशिष्ठ 卐
कोई आत्मा में नहीं है। आत्मा जगत् में रहित है। पर जगतरूप में उसका भान होता है। अहं-त्वं जो कुछ भासित होता है सो सब स्वप्नवत् है और भ्रम से सिद्ध हुआ है। जो सब का अधिष्ठान है, वह सत्य है और सब उसी में कल्पित हैं। जो अनुभव में देखिये तो सब आत्मस्वरूप हैं, और भिन्न देखिये तो कुछ नहीं। जैसे स्वप्न के देश, काल, पदार्थ सब अर्थाकार भासित होने पर भी मिथ्या हैं, वैसे ही यह विश्व भ्रम में प्रकट होता है। शब्द-अर्थ की अपेक्षा से वह ओर त् है और उनकी अपेक्षा से वह अहं है, वास्तव में दोनों नहीं—जो है सो आत्मा ही है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि त्वं से अहं तक और अहं से त्वं तक सब स्वप्न की सेना की तरह मिथ्या हैं और अनुभव से देखिये तो आत्मरूप है, तो बताइए हम स्वप्न सेना में हैं अथवा हमारा अहं आत्मा है? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अनात्म देहादिक में यह अहं-भावना करना कि मैं हूँ, स्वप्न-सेना के तुल्य है, और अधिष्ठान चिन्मात्र दृश्य और अहंकार से रहित अहंभावना करना आत्मरूप है। हे राम ! तुम आत्मरूप हो। यह विश्व सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। जो अधिष्ठानरूप से देखिये तो आत्मरूप है और जो अधिष्ठान से रहित देखिये तो मिथ्या है। वह अधिष्ठान शुद्ध, आनन्दरूप, चित्त से रहित चिन्मात्र परब्रह्म है। उसमें अज्ञान से दृश्य देख पड़ता है। जैसे असम्यक् दृष्टि से सीपी में रूपा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञानी दृश्य की कल्पना करते हैं।
हे राम ! दृश्य अविचार से सिद्ध है। विचार करने से कुछ वस्तु नहीं होती। पर जिसके आश्रय में वह कल्पित है वह अधिष्ठान सत्य है। जैसे सीपी के हट जाने से रूपे की बुद्धि जाती रहती है, वैसे ही आत्मविचार से विश्वबुद्धि जाती रहती है। जैसे समुद्र में पवन से तरङ्ग-चक्र उठते और प्रत्यक्ष होते हैं, पर विचार करने से तरङ्ग-चक्र में भी जलबुद्धि होती है, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र में मन के उठने से विश्वरूपी तरंग चक्र उठते हैं और विचार करने से तुमको मन के उठने में भी आत्मरूप भासित होगा, विश्वरूपी तरंग-चक्र न भासित