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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1163, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1163

* निर्वाण प्रकरण * [३५५]

होंगे और भ्रम निवृत्त हो जायगा। जो वस्तु स्फुरण में उपजी है वह स्फुरण न होने पर निवृत्त हो जाती है। यह विश्व अज्ञान मे उपजा है और ज्ञान से लीन हो जायगा। इससे विश्व को भ्रममात्र जानो। राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने कहा कि ब्रह्मा, रुद्र आदि और उत्पत्ति संहार करने तक सब विश्व भ्रममात्र है। इस ज्ञान से क्या सिद्ध होता है? यह तो प्रत्यक्ष दुःखदायक लगता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो कुछ देखते हो सो सम्यक् दृष्टि से सब आत्मरूप है—कुछ भिन्न नहीं—और असम्यक् दृष्टि से विश्व है। यह दृष्टि का भेद है। सम्यक्-असम्यक् देखने में भी अधिष्ठान ज्यों का त्यों है। जैसे अन्धकार में रस्सी सर्प जान पड़ती है और भयदायक होती है, और जो प्रकाश में देखिये तो रस्सी ही देख पड़ती है, वैसे ही जिसने आत्मा को जाना है, उसको दृश्य संसार भी आत्मरूप है। अज्ञानी को विश्व प्रतीत होता है और दुःखदायी होता है। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना कर डरता है, और अपने अज्ञान से दुःख पाता है। तो अगर यथार्थ ज्ञान हो तो भय क्यों पावे?

हे राम! जीव अपने ही संकल्प से आप बँधता है। जैसे कुमवारी नाम का कीड़ा अपने बैठने का स्थान बनाकर आपही उसमें कैद होकर मरता है, वैसे ही अनात्मा में अहं प्रतीत करके जीव आप ही दुःख पाता है। हे राम! जीव आप ही संसारी और आप ही ब्रह्म होता है। जब दृश्य की ओर जाता है, तब संसारी होता है और जब स्वरूप की ओर जाता है तब ब्रह्म आत्मा होता है। इसमें जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। जो संसारी होने की इच्छा हो तो संसारी बनो और जो ब्रह्म होने की इच्छा हो तो ब्रह्म हो जाओ। मुझसे पूछो तो दृश्य अहंकार को त्यागकर आत्मा में स्थित हो रहो। यह विश्व भ्रममात्र है, वास्तव नहीं। यही पुरुषार्थ है कि संकल्प से संकल्प को काटो। जब बाहर से अन्तर्मुख होगे, तब ब्रह्म ही भासित होगा और दृश्य की कल्पना मिट जावेगी; क्योंकि यह दृश्य आगे भी नहीं था। हे राम! जो सत् वस्तु आत्मा है, उसका अनेक यत्नों से भी नाश नहीं होता, और जो असत्य