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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1164, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1164

३५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

अनात्मा है, उसके निमित यत्न कीजिये तो मन नहीं होता। जो सत्य वस्तु है, उसका कदापि अभाव नहीं, और जो असत है, उसका भाव नहीं होता। असत वस्तु तबतक भासित होती है, जबतक उसको भली प्रकार नहीं जाना जाता। जब विचार में देखिये, तब नष्ट हो जाती है। अविद्या के पदार्थ विद्या में नष्ट हो जाते हैं—जैसे स्वप्न का सुमेरु पर्वत सत्य हो तो जाग्रत में भी दिखे—इसमें वास्तव में वह है ही नहीं। यह संसार जो तुमको दिखता है, सो स्वरूप के ज्ञान से नष्ट हो जावेगा। इसमें पूछो तो हमको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं दिखता, सब आत्मा ही है। यह भाव भी हममें नहीं कि यह जीव अज्ञानी है, किसी प्रकार मोक्ष हो। न हमको ज्ञान से प्रयोजन है, न मोक्ष होने से प्रयोजन है, क्योंकि हमको सब आत्मा ही दिखता है।

हे राम! जबतक चेतन है तबतक मरना और जन्म भी पाता है। जब जड़ या निर्वाण होता है, तब शान्ति को पाकर मुक्त होता है। चेतन दृश्य की ओर वासना को कहते हैं, इसी से जीव जन्म-मरण के बन्धन में पड़ता है। जब दृश्य के स्फुरण की ओर से जड़ सा हो जाता है, तब मुक्त होता है। इसका होना ही दुःख और न होना ही मुक्ति है। अहंकार का होना बन्धन है और अहंकार का न होना मुक्ति। इसमें पुरुष-प्रयत्न यही है कि अहंकार का त्याग करे और चैतन्य ब्रह्मघन अपने रूप में स्थित होओ। जिनको संसार के सत होने की भावना है, उनको संसार ही होता है, ब्रह्म नहीं मिलता और जिनको ब्रह्मभावना हुई है, उनको ब्रह्म ही भासित होता है। हे राम! चाहे पाताल में जाय अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी दसों दिशा, आकाश, देवताओं के स्थान में फिरे तो भी सुख न पावेगा और आत्मा का दर्शन न होगा; क्योंकि अनात्म का अहंकार करने से सुख नहीं मिलता। जब आत्मदर्शी होकर देखोगे तो सब आत्मा ही भासित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वविजयो नाम सप्तदशाधिकशततमसर्गः ॥ ११७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार संकल्पमात्र और तुच्छ है।